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अरबी

1

वह महिमाओं की महिमा है!

यह वह सार है, जो गरिमा के साम्र्राज्य से उतरा है, बल और शक्ति की वाणी से उच्चरित हुआ और प्राचीन युग के अवतारों के लिए प्रकट किया गया। हमने इसके अन्तर्निहित तत्व को लिया है और इसे संक्षिप्तता का वस्त्र पहनाया। इसे हमने धर्मपरायण लोगों को अपनी कृपा के चिह्नस्वरूप प्रदान किया ताकि वे महान संविदा के प्रति निष्ठावान बनें, अपने जीवन में उस महान के विश्वास को सार्थक करें और आभालोक में पहुँचकर दिव्य गुणों का रत्न प्राप्त करें।

हे चेतना के पुत्र !

मेरा प्रथम परामर्श यह है: एक शुद्ध, दयालु एवं प्रकाशमय हृदय धारण कर, ताकि पुरातन, अमिट एवं अनन्त श्रेष्ठता का साम्राज्य तेरा हो।

2

हे चेतना के पुत्र !

मेरी दृष्टि में सर्वाधिक प्रिय वस्तु है न्याय! तुझे यदि मेरी अभिलाषा है तो उससे विमुख न हो और उसकी अवहेलना न कर, ताकि तू मेरा विश्वासपात्र बन सके। इसकी सहायता से तू दूसरों की आँखों से नहीं बल्कि स्वयं अपनी आँखों से देखने लगेगा, अपने पड़ोसी के ज्ञान से नहीं बल्कि स्वयं अपने ज्ञान से जानने लगेगा। अपने अन्तःकरण में इस पर मनन कर कि तुझे कैसा होना योग्य है। वस्तुतः न्याय तेरे लिये मुझ महान का एक उपहार और मेरी सप्रेम दयालुता का प्रतीक है। अतः इसे अपने नेत्रों के सम्मुख धारण कर।

3

हे मनुष्य के पुत्र !

अपने अतिप्राचीन अस्तित्व तथा अपनी पुरातन अखंडता में छिपा हुआ मैं तेरे प्रति अपने प्रेम को जानता था; इसलिए मैंने तेरी उत्पत्ति की, तुझ पर अपने स्वरूप को उत्कीर्ण किया और तेरे समक्ष अपने सौन्दर्य को प्रकट किया।

4

हे मनुष्य के पुत्र !

तेरा सृजन मुझे प्रिय था, इसीलिए मैने तेरी रचना की। अतः, तू मुझसे प्रेम कर, ताकि मैं तेरे नाम की चर्चा करूँ और तेरी आत्मा को जीवन की चेतना से भर सकूँ।

5

हे अस्तित्व के पुत्र !

मुझसे प्रेम कर ताकि मैं भी तुझसे प्रेम करूं। यदि तू मुझसे प्रेम नहीं करेगा, तो मेरा प्रेम भी तुझ तक कदापि नहीं पहुंचेगा। रे सेवक, इसे जान ले।

6

हे अस्तित्व के पुत्र !

तेरा स्वर्ग है मेरा प्रेम, तेरा स्वर्गिक आवास है मुझसे तेरा पुनर्मिलन। उसमें प्रवेश कर और विलंब न कर। हमारे शस्य लोक, हमारे महान साम्राज्य में तेरे लिए जो नियत किया गया है, वह यही है।

7

हे मनुष्य के पुत्र !

यदि तू मुझसे प्रेम करता है तो स्वयं से विमुख हो जा; यदि तू मेरी प्रसन्नता चाहता है तो स्वयं की इच्छाओं से मुंह फेर ले ताकि तू मुझमें विलीन हो जाए और मैं सदा-सर्वदा तुझमें जीवित रहूँ।

8

हे चेतना के पुत्र !

तेरे लिए शांति नहीं है सिवाय इसमें कि तू अपने आपको तज दे और मेरी ओर अभिमुख हो, क्योंकि तुझे शोभा यह देता है कि मेरे नाम में गौरव करे, न कि अपने नाम में, मुझ में अपना भरोसा रखे, न कि अपने आप में, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मैं अकेला ही और प्रत्येक विद्यमान वस्तु से अधिक चाहा जाऊँ।

9

हे अस्तित्व के पुत्र !

मेरा प्रेम मेरा शक्ति-शिविर है; जो उसमें प्रवेश करेगा वह सुरक्षित होगा और जो उससे विमुख होगा निश्चय ही भ्रष्ट और नष्ट हो जाएगा।

10

हे दिव्यवाणी के पुत्र !

तू मेरा दुर्ग है, उसमें प्रवेश कर ताकि तू सुरक्षित रह सके। मेरा प्रेम तुझ में निहित है, इसे जान ले ताकि तू मुझे अपने निकट प्राप्त कर सके।

11

हे अस्तित्व के पुत्र !

तू मेरा दीपक है और तुझमें मेरा प्रकाश है। तू उसमें से अपनी कान्ति प्राप्त कर और मेरे अतिरिक्त किसी अन्य की कामना न कर। क्योंकि मैंने तुझे समृद्ध बनाया है और उदारतापूर्वक अपनी कृपा तुझ पर बरसाई है।

12

हे अस्तित्व के पुत्र !

शक्ति के हाथों से मैंने तुझे निर्मित किया है और बल की उंगलियों से मैंने तुझे उत्पन्न किया; और तेरे अन्तर में मैंने मुझ महान के तेज को रख छोड़ा है। उसमें संतोष रख और अन्य किसी की कामना न कर, क्योंकि मुझ महान का कौशल सर्वसम्पूर्ण है और मेरा आदेश अटल है, इस पर अविश्वास और शंका न कर।

13

ओ चेतना के पुत्र !

मैंने तुझे ऐश्वर्यवान उत्पन्न किया, फिर तू स्वयं को दरिद्रता के तल पर क्यों ला रहा है? मैंने तुझे श्रेष्ठ बनाया है, फिर तू स्वयं को क्यों गिरा रहा है? ज्ञान के सार से मैंने तुझे अस्तित्व दिया, फिर तू मेरे अतिरिक्त किसी अन्य से ज्ञान पाना क्यों चाहता है? प्रेम की माटी से मैंने तुझे गढ़ा, फिर तू किसी अन्य के साथ क्यों जुड़ गया ? अपनी दृष्टि अपने अंदर डाल ताकि तू मुझ शक्तिशाली, शौर्यवान तथा स्वयंजीवी को अपने भीतर खड़ा देख सके।

14

हे मनुष्य के पुत्र !

तू मेरा साम्राज्य है और मेरा साम्राज्य कभी नष्ट नहीं होता। फिर भला तुझे अपने विनाश का भय क्यों है ? तू मेरा तेज है और मेरा तेज कभी भी बुझाया नहीं जा सकता, फिर भला तू बुझ जाने का भय क्यों करता है ? तू मेरा प्रताप है और मेरा प्रताप कभी क्षीण नहीं होता; तू मेरा परिधान है और मेरा परिधान कभी भी जीर्ण-शीर्ण नहीं होगा। अतः, मेरे प्रति अपने प्रेम में दृढ़ रह ताकि प्रताप के महान लोक में तू मुझे प्राप्त कर सके।

15

हे दिव्यवाणी के पुत्र !

अपना मुखड़ा मेरी ओर कर और मेरे अतिरिक्त अन्य सब कुछ त्याग दे, क्योंकि मुझ महान की सत्ता शाश्वत है, उसका अन्त नहीं। यदि मेरे अतिरिक्त तुझे किसी अन्य की लालसा है, तो समझ ले कि भले ही कल्पान्त तक तू सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भी खोजता रहेगा तो निराशा को ही प्राप्त होगा।

16

हे प्रकाश के पुत्र !

मेरे अतिरिक्त अन्य सब कुछ भुला दे और मेरी आत्मा से संसर्ग रख। यह मेरी आज्ञा का सार तत्व है। अतः, इस ओर अभिमुख हो।

17

हे मनुष्य के पुत्र !

मुझ पर संतोष कर और किसी अन्य सहायक की खोज न कर, क्योंकि कोई नहीं, मात्र मैं ही तेरे लिए सर्वसम्पूर्ण हो सकता हूँ।

18

हे चेतना के पुत्र !

मुझसे वह न मांग जिसे हम तेरे लिए नहीं चाहते। तेरे हित हमने जो उपलब्ध कराया है, उस पर संतोष कर, क्योंकि एकमात्र यही तेरे लिए लाभदायक होगा, अगर तू उससे स्वयं को संतुष्ट कर ले।

19

ओ अद्भुत दृष्टि के पुत्र !

अपनी स्वयं की चेतना की एक सांस मैंने तुझमें फूंक दी है, ताकि तू मेरा प्रेमी बन सके। फिर, भला क्योंकर तूने मुझे बिसरा दिया है और मुझे छोड़कर किसी अन्य को अपना प्रेमपात्र बना लिया है ?

20

हे चेतना के पुत्र !

तुझ पर मेरा अधिकार विस्तृत है, इसे भुलाया नहीं जा सकता। तेरे प्रति मेरी अनुकम्पा अनन्त है, इसे छिपाया नहीं जा सकता। मेरे प्रेम ने तुम्हारे हृदय में अपना आवास बना लिया है, इसे झुठलाया नहीं जा सकता। मेरा तेज तुझमें विद्यमान है, इसे धुंधलाया नहीं जा सकता।

21

हे मनुष्य के पुत्र !

मैंने अपनी महिमा के देदीप्यमान वृक्ष पर तेरे लिए दिव्य फल झुला रखे हैं, तू उनसे मुंह मोड़कर गिरी हुई हीन वस्तुओं पर अपना मन क्यों खो बैठा है? तू उन्हीं वस्तुओं की ओर लौट जो तुझे स्वर्गलोक में अधिक लाभदायक होंगी।

22

हे चेतना के पुत्र !

मैंने तुझे उत्तम उत्पन्न किया है, फिर भी तूने अपने आप को गिरा दिया है। उठ, उसी को प्राप्त कर, जिसके लिए तेरा सृजन किया गया है।

23

हे सर्वश्रेष्ठ के पुत्र !

मैं अमरत्व की ओर तेरा आह्वान कर रहा हूँ, फिर भी तू उस ओर मन लगाए हुए है जो नाशवान है। किस वस्तु ने भला तुझे हमारी इच्छा के विरुद्ध होकर निज इच्छा की ओर अभिमुख कर दिया है?

24

हे मनुष्य के पुत्र !

अपनी मर्यादा का उल्लंघन न कर और न उस वस्तु का दावा कर जो तेरे योग्य नहीं है। शक्ति और पौरुष के स्वामी अपने ईश्वर के मुखारबिन्द के समक्ष स्वयं को समर्पित कर दे।

25

हे चेतना के पुत्र !

दीन-हीन पर शेखी न बघार, क्योंकि मैं उसका मार्गदर्शन करता हूँ और जब तुझे कुचेष्टा करते हुए देखता हूँ तब सदासर्वदा के लिए तुझको हतबुद्धि कर देता हूँ।

26

हे अस्तित्व के पुत्र !

तू स्वयं के दोषों को भला कैसे भूल गया और दूसरों के दोष निकालने में त ूने अपने आप को क्यों व्यस्त कर लिया ? जो कोई भी ऐसा करता है वह मेरे श्राप का भागी बनता है।

27

हे मनुष्य के पुत्र !

जब तक तू स्वयं पाप कर्म में लिप्त है, दूसरे के पापों का विचार भी न कर। यदि तूने इस आज्ञा का उल्लंघन किया तो तू शापित बन जाएगा और इसका साक्षी स्वयं मैं हूँ।

28

हे चेतना के पुत्र !

सुनिश्चित रूप से तू यह सत्य समझ ले। जो दूसरों को न्यायनिष्ठ बनने का उपदेश देता है किन्तु स्वयं अन्याय में लिप्त रहता है, वह मेरा नहीं है, चाहे वह मेरे नाम को ही क्यों न धारण करता हो।

29

हे अस्तित्व के पुत्र !

जिस आरोप को तू अपने ऊपर लगाया जाना पसंद नहीं करता उसे किसी अन्य आत्मा पर आरोपित न कर और तू जो स्वयं नहीं कर सकता उसका उपदेश दूसरों को न दे। तेरे लिए यह मेरी आज्ञा है, इसका पालन कर।

30

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरा कोई सेवक तुझसे कभी कुछ मांगे तो तू उसे देने से इन्कार न कर, क्योंकि उसका रूप मेरा ही रूप है। इन्कार कर तू स्वयं को मेरे समक्ष लज्जित करता है।

31

हे अस्तित्व के पुत्र !

अन्तिम लेखा-जोखा हो उससे पहले तू प्रतिदिन अपने कर्मों का निरीक्षण कर लिया कर, क्योंकि मृत्यु का आगमन अघोषित होगा और तुझे अपने कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने को कहा जाएगा।

32

हे सर्वश्रेष्ठ के पुत्र !

मृत्यु को मैंने तेरे लिए आनन्द के एक सन्देशवाहक के रूप में भेजा है, फिर तू दुःख क्यों करता है ? तेज को हमने तुझ पर प्रकाश डालने हेतु रचा है, फिर तू स्वयं को उससे छुपाता क्यों है ?

33

हे चेतना के पुत्र !

आनन्ददायक प्रकाश के संवाद द्वारा मैं तेरा आह्वान करता हूँ, आनन्द मना ! मैं तुझे पवित्रता के मंदिर में आमंत्रित करता हूँ। उसमें प्रवेश कर, ताकि तू शाश्वत शांति का भागी बन सके।

34

हे चेतना के पुत्र !

पावनता की चेतना ने तुझे पुनर्मिलन का सुखद समाचार दिया है, फिर भला तू दुःखी क्यों है ? शक्ति की चेतना तुझे अपने धर्म में प्रतिष्ठापित कर रही है, फिर भला तू स्वयं को छिपाता क्यों है ? उसकी अनुपम छवि तेरा मार्गदर्शन कर रही है, फिर भला तू भटक कैसे सकता है ?

35

हे मनुष्य के पुत्र !

सिवाय इसके कि तू हम से दूर है, किसी अन्य बात का खेद न कर। सिवाय इसके कि तू हमारे निकट आता जा रहा है और हमारी ओर लौट रहा है, किसी अन्य बात से प्रसन्न न हो।

36

हे मनुष्य के पुत्र !

अपने हृदय के आनंद में लीन रह ताकि तू मुझसे मिलन करने तथा मेरे सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित करने के योग्य बन सके।

37

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरे अद्भुत वस्त्रालंकार से स्वयं को विहीन न कर और मेरी अलौकिक अमृतधारा से वंचित न हो, अन्यथा तू सदा-सर्वदा के लिए प्यासा रह जाएगा।

38

हे अस्तित्व के पुत्र !

मुझसे प्रेम के कारण मेरे विधानों का पालन कर और यदि तुझे मेरी प्रसन्नता की कामना है तो स्वयं को उससे विमुख कर ले जिसकी तुझे लालसा है।

39

हे मनुष्य के पुत्र !

यदि तू मेरे सौन्दर्य से प्रेम करता है तो मेरी आज्ञाओं की अवहेलना न कर, यदि तू मेरी सद्कृपा प्राप्त करना चाहता है तो मेरे परामर्श को न भूल।

40

हे मनुष्य के पुत्र !

यदि तू अन्तरिक्ष की गहनता को चीरता हुआ भी निकल जाए और आकाश के फैलाव को भी छान मारे तो भी हमारी आज्ञा के प्रति सर्वसमर्पण किए बिना एवं हमारे मुखमण्डल के समक्ष नतमस्तक हुए बिना तुझे कहीं शांति प्राप्त नहीं होगी।

41

हे मनुष्य के पुत्र !

तू मेरे धर्म का विराट रूप दिखा ताकि मैं अपनी महानता के रहस्यों को तेरे समक्ष प्रकट करूँ और अनंतता के प्रकाश के साथ तेरे ऊपर चमकूँ।

42

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरे समक्ष स्वयं को झुका दे ताकि मैं अनुग्रहपूर्वक तुझे दर्शन दे सकूँ। मेरे धर्म की विजय के लिए उठ खड़ा हो ताकि जब तू पृथ्वी पर ही है तब ही विजय प्राप्त कर सके।

43

हे अस्तित्व के पुत्र !

मेरी पृथ्वी पर मेरा उल्लेख कर ताकि अपने स्वर्ग में मैं तुझे याद रखूँ। इस प्रकार मेरे और तेरे नेत्रों को शीतलता मिलेगी।

44

हे सिंहासन के पुत्र !

तेरी श्रवणेन्द्रियाँ मेरी श्रवणेन्द्रियाँ हैं, उनसे तू सुन। तेरी आँखें मेरी आँखें हैं, उनसे ही देख, ताकि अपनी अन्तरात्मा में तू मेरी उच्चतम पावनता का प्रमाण दे सके और मै ं तेरे उच्च स्थान का साक्षी बन सकूं।

45

हे अस्तित्व के पुत्र !

मेरी इच्छा से संतुष्ट होकर और जो भी मैंने आदेश दिया है उसके प्रति कृतज्ञ होकर, मेरे मार्ग में एक शहीद की वीरगति पाने की अभिलाषा रख, ताकि गरिमा के चंदोवे तले, महिमा के मंडप में तू मेरे साथ निवास कर सके।

46

हे मनुष्य के पुत्र !

विचार कर और सोच ले। क्या तेरी इच्छा अपनी शय्या पर पड़े-पड़े मर जाने की है या अपना लहू बहाकर, मेरे पथ में एक शहीद की वीरगति प्राप्त करने की है ? और इस प्रकार सर्वोच्च स्वर्ग में मेरी आज्ञा का मूर्त रूप और मेरी ओजस्विता को प्रकट करने वाला बनने की है ? रे सेवक, सही चुनाव कर ले।

47

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरे सौन्दर्य की सौगंध ! तेरा अपने लहू से अपने केशों को रंगना मेरी दृष्टि में ब्रह्माण्ड की सृष्टि और दोनों लोकों के आलोक से अधिक महान कार्य है। इसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर, रे सेवक !

48

हे मनुष्य के पुत्र !

प्रत्येक वस्तु का अपना एक चिह्न होता है। प्रेम का चिन्ह है मेरे आदेशों में दृढ़ता और मेरी परीक्षाओं की घड़ी में धैर्य धारण किये रहना।

49

हे मनुष्य के पुत्र !

सच्चा प्रेमी कष्ट की कामना उसी प्रकार करता है जिस प्रकार विद्रोही क्षमा और पापी दया की याचना करता है।

50

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरी राह में यदि तुझ पर विपत्तियाँ न टूट पड़ें तो तू उन लोगों के मार्ग का अनुसरण भला कैसे कर सकेगा जो मेरी प्रसन्नता से संतुष्ट हैं। मुझसे मिलन की इच्छा में अगर तुझे परीक्षायें न आ घेरें तो भला मेरे सौन्दर्य के लिए अपने प्रेम में तू प्रकाश की प्राप्ति कैसे कर सकेगा।

51

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरी ओर से दी जाने वाली विपत्ति मेरी अनुकम्पा है। बाह्यरूप में यह अग्नि और प्रतिशोध है किन्तु आन्तरिक रूप में यह प्रकाश और दया है। शीघ्रता कर और उसे गले लगा ले ताकि तू प्रकाश का अनन्त पुंज तथा एक अमर आत्मा बन सके। यह तेरे लिए मेरी आज्ञा है, इसका पालन कर।

52

हे मनुष्य के पुत्र !

यदि तुझे अपार वैभव प्राप्त हो जाए तो हर्षोन्मादित न हो और यदि तुझ पर दुर्भाग्य टूट पड़े तो शोकाकुल न हो, क्योंकि दोनों ही अवस्थायें क्षणभंगुर हैं और दोनों ही समाप्त हो जायेंगी।

53

हे अस्तित्व के पुत्र !

यदि दरिद्रता तुझे ग्रस्त कर ले तो दुःखी न हो, क्योंकि यथासमय वैभव का स्वामी तुझ तक पदार्पण करेगा। दुर्भाग्य से भय न कर, क्योंकि एक दिन वैभव तुझ पर आसीन होगा।

54

हे अस्तित्व के पुत्र!

यदि तेरे हृदय का लक्ष्य इस अनन्त एवं अमिट साम्राज्य तथा इस अनादि एवं शाश्वत जीवन को प्राप्त करना है तो इस नाशवान और चलायमान वैभव का त्याग कर दे।

55

हे अस्तित्व के पुत्र !

स्वयं को सांसारिकता में लिप्त न रख, क्योंकि अग्नि से हम स्वर्ण की और स्वर्ण से हम अपने सेवकों की परीक्षा लेते हैं।

56

हे मनुष्य के पुत्र !

तुझे स्वर्ण की लालसा है और मैं इससे तेरी मुक्ति चाहता हूँ। इसकी प्राप्ति पर तू स्वयं को धनवान समझने लगता है और मैं इससे तेरी विरक्ति में ही तेरा ऐश्वर्य मानता हूँ। मेरे जीवन की सौगंध, यह मेरा ज्ञान और वह तेरा भ्रम हैं, फिर मेरा मार्ग तेरे पथ से कैसे मेल खा सकता है?

57

हे मनुष्य के पुत्र !

तू अपनी धन-सम्पदा को मेरे निर्धनों पर न्योछावर कर दे ताकि स्वर्ग में शाश्वत उज्ज्वलता के भंडारों तथा अमर गौरव के कोषों के वैभव तुझे प्राप्त होते रहें। मेरे अपने जीवन की सौगंध ! यदि तू मेरे नेत्रों से देख सके तो अपनी आत्मा का उत्सर्ग कर देना एक और भी अधिक गौरवपूर्ण बात है।

58

हे मनुष्य के पुत्र !

अस्तित्व का मंदिर मेरा सिंहासन है इसे हर मलीनता से स्वच्छ रख, ताकि मैं वहां प्रतिष्ठापित हो सकूँ और वहाँ पर स्थित रहूँ।

59

हे अस्तित्व के पुत्र !

तेरा हृदय मेरा निवास स्थान है, मेरे अवतरण के लिए इसे स्वच्छ रख। तेरी आत्मा मेरी अवतरण-स्थली है, मेरे प्राकट्य के लिए इसे स्वच्छ रख।

60

हे मनुष्य के पुत्र !

अपने हाथ मेरे वक्षस्थल पर रख ताकि मैं तेजोमय तथा प्रकाशवान होकर तुझ पर आच्छादित हो सकूँ।

61

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरे महालोक की ओर बढ़, ताकि तू पुनर्मिलन के आनन्द की प्राप्ति का भागी बने और अक्षय महिमा के पात्र से अनुपम अमृत का पान कर सके।

62

हे मनुष्य के पुत्र !

देखते-देखते अनेक दिन बीत गये और तूने स्वयं को अपनी कल्पनाओं एवं मिथ्या मनसूबों में ही लीन कर रखा है। अपनी शय्या पर भला तू कब तक अचेत पड़ा रहेगा ? अपनी निद्रा से जाग, क्योंकि ‘सूर्य’ का मध्याकाश तक आगमन हो चुका है, कदाचित अपने सौन्दर्य के प्रकाश द्वारा वह तुझे भी प्रभामण्डित कर दे !

63

हे मनुष्य के पुत्र !

परम पावन ‘पर्वत’के क्षितिज से तुझ पर प्रकाश विकीर्ण हुआ है और तेरे हृदयरूपी सिनाई पर्वत में ज्ञान की चेतना ने जीवन की सांस फूँक दी है। इसलिये, व्यर्थ कल्पनाओं के आवरणों से स्वयं को मुक्त कर ले और मेरे दरबार में प्रवेश कर ताकि तू अनन्त जीवन के लिए उपयुक्त और मुझसे मिलन के योग्य बन सके। इस प्रकार न तो मृत्यु, न थकान और न ही विपत्ति की छाया तुझ पर पड़ सकेगी।

64

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरी अनन्तता मेरी सृष्टि है, मैंने तेरे लिये इसकी रचना की है। इसे तू अपने मंदिर का परिधान बना। मेरी एकता मेरा हस्तकौशल है, तेरे लिये ही मैंने इसे बनाया है। उससे स्वयं को विभूषित कर ताकि अनन्तकाल तक तू मेरी अनन्त महिमा का प्राकट्य बिन्दु बना रहे।

65

हे मनुष्य के पुत्र !

मेरा ऐश्वर्य तेरे लिए मेरा उपहार है और मेरी ऐश्वर्यमयता तेरे प्रति मुझ महान की करुणा का प्रतीक है। जो कुछ मुझे योग्य लगता है उसे कोई नहीं समझ सकेगा और न कोई उसका वर्णन कर सकता है। वस्तुतः अपने सेवकों के प्रति अपनी प्रेममयी दया तथा अपने जनों के प्रति अपनी करुणा के चिह्नस्वरूप इसे मैंने अपने गुप्त भंडार-गृहों तथा अपनी आज्ञाओं के कोषों में सुरक्षित रख छोड़ा है।

66

हे दिव्य और अदृश्य सार की संतानो !

मुझसे प्रेम करने से तुम्हें रोका जाएगा और जब आत्माएँ मुझ महान का सुमिरन करेंगी तब व्याकुल हो उठेंगी, क्योंकि मानव-मन मुझे समझ नहीं सकता और न ही हृदय मुझे अपने आप में समा सकता है।

67

हे सौन्दर्य के पुत्र !

मेरी चेतना और मेरे अनुग्रह की सौगंध ! मेरी करुणा और मेरे सौन्दर्य की सौगंध ! शक्ति की वाणी से जो कुछ मैंने तेरे समक्ष प्रकट किया है और शौर्य की लेखनी से जो कुछ मैंने तेरे लिये लिपिबद्ध किया है वह सब तेरी समझ और क्षमता के अनुकूल है, मेरी महानता और स्वर-गरिमा के सदृश्य नहीं।

68

हे मनुष्य की संतानो !

क्या तुम यह नहीं जानते कि हमने तुम सबको एक ही मिट्टी से क्यों पैदा किया ? इसलिये कि कोई प्राणी अपने को दूसरे से श्रेष्ठ न समझे। सदैव स्मरण रखो और अपने हृदय को टटोलो कि तुम्हारी उत्पत्ति कैसे हुई थी ? चूंकि हमने एक ही तत्व से तुम्हारी उत्पत्ति की है, त ुम्हारा यह परम कर्तव्य है कि तुम एक आत्मा के समान रहो, एक साथ चलो, एक ही समान भोजन करो और एक धरा पर रहो, ताकि तुम्हारे अन्तर्तम जीवन से, तुम्हारे कर्मों और यत्नों से एकता के चिह्नों और त्याग की सुगंध का साक्षात्कार हो सके। यही मेरा परामर्श है तुम्हारे लिए, ओ तेजोमयता के अनुचरों ! इस उपदेश का पालन करो ताकि अनुपम महिमा के वृक्ष से तुम्हे पावनता के फल प्राप्त हो सकें।

69

हे तू चेतना के पुत्रो !

तुम मेरे कोषालय हो, क्योंकि तुम में ही मैंने अपने महान रहस्यों के मोती तथा अपने महाज्ञान के रत्नों को सुरक्षित रख छोड़ा है। मेरे भक्तों के बीच जो अजनबी हैं तथा मेरे जनों में जो लोग नास्तिक हैं उनसे इनकी रक्षा करो।

70

हे उसकी संतान, जो अपने अस्तित्व के साम्राज्य में स्वयं अपने ही बल से कायम है !

तू यह समझ ले कि पवित्रता की सम्पूर्ण सुरभि को मैं तुझ तक प्रवाहित कर चुका हूँ और मैंने अपने शब्द तुझ पर पूर्णतः प्रकट कर दिये हैं। तेरे द्वारा अपनी उदारता की परिपूर्णता को सिद्ध कर चुका हूँ और तेरे लिए वह कामना कर चुका हूँ जिसकी इच्छा स्वयं मुझे अपने लिए है। अतः मेरे अनुग्रह से तृप्त हो और मेरे प्रति कृतज्ञ रह।

71

हे मनुष्य के पुत्र !

हमने तेरे हित जो कुछ प्रकटित किया है, वह सब अपनी चेतना की पाती पर प्रकाश की स्याही से अंकित कर ले। ऐसा कर सकना यदि तेरी क्षमता के बाहर है तो फिर अपने हृदयों के सारतत्व को अपनी स्याही बना ले। यदि यह भी करना तेरे लिए साध्य न हो तो फिर उस रक्ताभ स्याही से अंकित कर जो मेरे मार्ग में बहाई गई है। निःसन्देह यह मुझे अन्य सभी से अत्यधिक प्रिय है। इसकी ज्योति सदैव टिकी रहे।

फ़ारसी

1

उस दिव्यवाणी के प्रभु, सर्वशक्तिमान के नाम पर !

ओ समझने योग्य मस्तिष्क और सुनने योग्य कान रखने वाले लोगों ! परमप्रिय का सर्वप्रथम आह्वान यह हैः ओ रहस्यमय बुलबुल ! चेतना की गुलाब-वाटिका के अतिरिक्त अन्य कहीं विश्राम न कर। ओ प्रेम के सुलेमान के दूत ! सर्वप्रिय के ‘शेबा’ के अतिरिक्त किसी अन्य ठौर पर आश्रय प्राप्ति की इच्छा न रख और हे अमर पखेरू ! वफादारी के पर्वत के अतिरिक्त अन्य कहीं विचरण न कर। वहीं है तेरा निवास, यदि तू अनन्तता के लोक तक अपनी आत्मा के पंखों स उड़े और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की तुझमें लगन हो।

2

हे चेतना के पुत्र !

पक्षी अपने नीड़ की कामना करता है और बुलबुल गुलाब के सौंदर्य की, जबकि मानवात्मा रूपी पखेरू क्षणभंगुर धूल से ही संतुष्ट हो अपने अमर नीड़ से बहुत दूर भटक चुके हैं और असावधानी के दलदल की ओर आंखें बंद किये दिव्य सान्निध्य के गौरव से वंचित हैं। हाय! कितना विचित्र और दयनीय है यह कि मात्र एक प्याली भर के लिए अपने परमोच्च के उमड़ते हुए सागर से उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है और प्रभामंडित क्षितिज से दूर हो गये हैं।

3

हे मित्र !

अपनी हृदय-वाटिका में प्रेम के गुलाब के अतिरिक्त अन्य कुछ भी न उपजा और स्नेह तथा कामना के बुलबुल के प्रति अपनी निष्ठा को सुदृढ़तापूर्वक धारण किये रह। धर्मात्माओं की संगत को बहुमूल्य समझ और ईश्वर से विमुख लोगों के साथ का पूर्ण परित्याग कर।

4

हे न्याय के पुत्र !

अपनी प्रियतमा की नगरी के अतिरिक्त कोई प्रेमी भला और कहाँ जा सकता है ? अपनी हृदयाकांक्षा के अतिरिक्त किसी आकांक्षी को भला कहाँ शांति मिल सकती है ? सच्चे प्रेमी के लिए पुनर्मिलन ही जीवन है और वियोग ही मृत्यु। उसका वक्ष अधीर और उसका हृदय अशांत रहता है। अपने प्रियतम के निवास तक शीघ्रातिशीघ्र पहुंचने के लिए वह शत-शत जीवन का भी उत्सर्ग कर देगा।

5

हे धूल के पुत्र !

तुझे निश्चयपूर्वक कह रहा हूँ, सम्पूर्ण मनुष्यों में सर्वाधिक अचेत वह व्यक्ति है जो बैठा-बैठा विवाद करता रहता है और अपने बंधु बांधवों से अपने आपको ऊँचा समझता है; कह दो, हे बंधु ! शब्दों को नहीं बल्कि कर्मों को ही अपने आभूषण बना।

6

हे धरती के पुत्र !

वस्तुतः यह समझ ले कि ऐसा हृदय जिसमें लेशमात्र भी ईष्र्या के चिह्न अभी तक समाए हुए हैं वह मेरे अनन्त लोक में प्रवेश नहीं करेगा और न ही पवित्रता के मेर साम्राज्य से उठती हुई सुवासों की सुमधुर सुरभि को वह अपने भीतर ले पाएगा।

7

हे प्रेम के पुत्र !

इन शोभायमान ऊँचाइयों से तथा प्रेम के सुपवित्र तरुवर से तू केवल एक ही पग दूर है: एक पग और रख और अगले पग के साथ ही तू अमरत्व के लोक में पहुँचकर अनन्तता के महामंच को प्राप्त हो जा। अतः, महान शोभा की लेखनी के द्वारा जो प्रकट किया गया है, उस पर ध्यान दे।

8

हे गरिमा के पुत्र !

पावनता की राह पर तेज चल और मुझ महान से सम्भाषण के स्वर्ग में प्रवेश कर। चेतना के तेज से अपने हृदय को निर्मल बना और परमोच्च के दरबार तक पहुंचने की शीघ्रता कर।

9

हे चंचल छाया !

शंका की अधमतर स्थितियों को पार कर जा और सुनिश्चितता की कीर्तिमान ऊँचाइयों तक उठ। सत्य का नेत्र खोल ताकि तू उस परमप्रिय के अनावृत सौन्दर्य का साक्षात्कार कर सके और पुकार उठे, सर्वश्रेष्ठ सृष्टिकर्ता, स्वामी का महिमागान हो !

10

हे लालसा के पुत्र !

ध्यानपूर्वक सुन: पार्थिव नेत्र अनन्त सौन्दर्य को कभी पहचान न पायेंगे और निष्प्राण हृदय विनष्ट बहार के अतिरिक्त अन्य कहीं से आनन्द की कामना नहीं करेगा, क्योंकि जो जैसा होता है वह वैसे को ही ढूंढ़ता और अपनी तरह की संगत में ही आनन्द पाता है।

11

हे धूल के पुत्र !

अपनी आँखें मूंद ले ताकि तू मेरे रूप को देख सके, अपने कानों को बंद कर ले, ताकि तू मेरे स्वर की सुमधुर रागिनी का रसास्वादन कर सके। समस्त ज्ञान से स्वयं को रिक्त कर ले, ताकि तू मुझ महान का ज्ञान प्राप्त कर सके और स्वयं को धन-वैभव से बिल्कुल निर्मल कर ले, ताकि मेरी अनन्त सम्पदा के महासागर से तू अपना स्थायी भाग प्राप्त कर सके। मेरे सौन्दर्य के अतिरिक्त अन्य सब ओर से अपनी आँखें मूंद ले, मेरे शब्दों के अतिरिक्त अन्य कुछ भी न सुन, मेरे ज्ञान के अतिरिक्त अन्य सभी ज्ञान से स्वयं को रिक्त कर ले, ताकि तू स्पष्ट दृष्टि, एक निर्मल हृदय के साथ और एकाग्रचित होकर मेरी पावनता के दरबार में प्रवेश कर सके।

12

हे दो दृष्टि के मनुष्य !

एक नेत्र को मूंद लो और दूसरे को खोल दो। एक को संसार और उसमें विद्यमान पदार्थों की ओर से मूंद लो और दूसरे को परमप्रिय के विश्वमोहन स्वरूप के दर्शन के निमित्त खोल दो।

13

हे मेरी संतानो !

मुझे भय है कि स्वर्गिक कपोत के मधुर राग से वंचित होकर पुनः तू विनाश की छाया में न समा जाए और गुलाब के सौन्दर्य को निरखे बिना ही कहीं जल और मिट्टी में न लौट जाए।

14

हे मित्रो !

एक नाशवान सौन्दर्य के लिए अनन्त सौन्दर्य का परित्याग न कर और मिट्टी के इस नाशवान संसार से अनुराग न रख।

15

हे चेतना के पुत्र !

वह समय आयेगा जब पावनता की बुलबुल अन्तरतम के रहस्यों का और अधिक उद्घाटन नहीं करेगी और तुम सभी उस प्रभामंडित आकाश से आते सुमधुर स्वर को सुनने से वंचित रह जाओगे।

16

हे प्रमाद के सारतत्व !

कोटि-कोटि पवित्र कंठों को स्वर प्राप्त होते हैं एक ही वाणी से और एक ही राग से कोटि-कोटि गुप्त रहस्य प्रकट होते हैं। किन्तु खेद है कि न तो उसे सुनने के लिए कोई श्रोता है, और न ही उसे समझने के लिए कोई हृदय ही है।

17

हे साथियों !

‘स्थानरहित’मंच के कपाट पूरी तरह खुले पड़े हैं और प्रियतम का निवासस्थल प्रेमियों के लहू से शोभायमान हो रहा है, किन्तु कुछ को छोड़कर सब प्राणी इस स्वर्गिक नगर से दूर रह गए हैं और इन चंद लोगों में से केवल मुठ्ठी भर लोग ही शुद्ध हृदय और पवित्र आत्मा वाले पाये गये हैं।

18

हे उच्चतम स्वर्ग के निवासियों !

आश्वासन की संतानों के समक्ष घोषणा कर दो कि पवित्रता के लोक के अंदर, ईश्वरीय स्वर्ग के निकट एक नया उद्यान प्रकट हुआ है जिसकी परिक्रमा उच्चतम लोक के वासी तथा सर्वपवित्र स्वर्ग के अमर निवासी कर रहे हैं। प्रयत्न करो ताकि तुम यह पद प्राप्त कर सको, उसके गुम्फित पुष्पों से तुम प्रेम के रहस्यों का साक्षात्कार कर सको और उसके शाश्वत फलों से दिव्य तथा निगूढ़ ज्ञान का रहस्य समझ सको। उनकी आंखें तृप्त हुई हैं जिन्होंने इस नये उद्यान में प्रवेश किया है और जो उसकी आज्ञाओं का पालन कर वहां दृढ़ रहे हैं।

19

हे मेरे मित्रो !

उस यथार्थ एवं प्रकाशयुक्त प्रभात को क्या तुमने भुला दिया है जब उस पावन तथा सौभाग्यशाली वातावरण में, उस कल्पतरु की छांव तले, जो सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग में लगाया गया है, तुम मेरी उपस्थिति में एकत्रित हुये थे ? भावविह्वल हो कर तुमने सुना था जब मैंने इन तीन अत्यन्त पवित्र आदेशों का उच्चार किया था-ओ मित्रो ! अपनी इच्छा को मेरी इच्छा से अधिक प्राथमिकता न दो, उस वस्तु की कामना कभी न करो जिसकी कामना मैंने तुम्हारे लिये नहीं की है और सांसारिक कामनाओं और लालसाओं से अपवित्र, निर्जीव हृदय लेकर मेरे निकट न आओ। यदि तुम केवल अपनी आत्माओं को निर्मल कर लो, तो तुम्हें तत्क्षण ही उस स्थल तथा उस परिवेश का स्मरण हो जाएगा और तुम्हारे मध्य मेरे उपदेशों की सत्यता स्पष्ट हो जाएगी।

20

स्वर्ग की पाती के पाँचवे भाग में, परम पावन पंक्तियों की आठवीं पंक्ति में वह कहते हैं:

असावधानी की शय्या पर मृतप्रायः पड़े हुए ऐ लोगों !

युग बीत गये हैं और तुम्हारे बहुमूल्य जीवन लगभग अवसान तक आ पहुँचे हैं फिर भी तुम्हारी ओर से हमारे पवित्र दरबार तक निर्मलता का एक भी उच्छ्वास नहीं पहुँच पाया है। यद्यपि तुम गलत धारणाओं के समुद्र में डूबे हुये हो तथापि तुम ईश्वर के धर्म का उपदेश देने वाले बने बैठे हो। जिससे मैं घृणा करता हूँ, तुमने उसे गले लगा रखा है और मेरे शत्रुओं को तुमने अपना मित्र बना रखा है। इतना कुछ होते हुये भी तुम मेरी धरा पर निश्चित हो घूम रहे हो और इससे अचेत बने बैठे हो कि मेरी पृथ्वी तुमसे ऊब चुकी है और इसकी हर चीज तुमसे कतरा रही है। काश! तुमने अपनी आँखें खोली होतीं तो निश्चय ही इस खुशी के बदले कोटि-कोटि दुःखों का वरण करते और मृत्यु को जीवन से बेहतर समझते।

21

हे धूल के गतिमान स्वरूप !

मैं तुझसे तादात्म्य चाहता हूँ, किन्तु तुझे मुझ पर विश्वास कहाँ है ? तेरे विद्रोह की तलवार ने तेरी आशा के वृक्ष को धराशायी कर दिया है। सदा सर्वदा मैं तेरे समीप हूँ। किन्तु तू सदैव मुझसे दूर है। मैंने तेरे लिए अमिट प्रतिष्ठा को चाहा है फिर भी तूने अपने लिये अंतहीन लज्जा का वरण किया है। अभी भी समय है, लौट आ और अपना अवसर हाथ से न गंवा।

22

हे लालसा के पुत्र !

ज्ञानी तथा गुणीजनों ने वर्षों प्रयत्न किया फिर भी वे उस महिमामय के सामीप्य को प्राप्त नहीं कर सके, उसकी खोज में उन्होंने अपने जीवन लगा दिये, फिर भी उसके सौन्दर्य की छवि को निरख पाने में वे असमर्थ रहे। तूने तनिक प्रयास से ही अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और बिना तलाश के अपनी जिज्ञासा का समाधान पा लिया। किन्तु इतना कुछ होते हुए भी तू समझ नहीं पाया। स्वार्थ के आवरण में इस तरह लिपटा रहा कि न तो उस परमप्रिय की रूप-राशि के दर्शन तेरी आँखों को हो सके और न तेरा हाथ उसके परिधान की छोर को स्पर्श ही कर पाया। तुम लोग, जिन्हें देखने की क्षमता है, देखो और विस्मय करो।

23

हे प्रीतिनगर के वासियों !

पार्थिव झंझावातों ने अनंत ज्योति को बुझा दिया है और दिव्य तरुण का सौन्दर्य, धूल की धुंध में ओझल हो गया है। प्रेम के सम्राटों के शिरोमणि को अत्याचार में प्रवृत्त पापी लोगों के द्वारा यातनाएँ पहुँचाई गई हैं और पवित्रता का कपोत उलूकों के पंजों में बंदी बना पड़ा है। महिमा के मंडप-वितान के निवासी तथा स्वर्ग के सहचर रुदन और विलाप कर रहे हैं जबकि तू उपेक्षा के लोक में विश्राम कर रहा है। इस पर भी तू स्वयं को सच्चे मित्रों में समझता है! तेरी कल्पनायें कितनी व्यर्थ हैं।

24

हे विद्वान कहलाने वाले मुर्खों!

तुम गड़ेरियों का वेष क्यों धारण किये हुए हो जबकि भीतर ही भीतर तुम लोलुप भेड़िये बन चुके हा और मेरे अनुयायियों पर घात लगाये बैठे हो ? तुम उस तारे की तरह हो जो प्रभात के पूर्व प्रकट होता है और यद्यपि वह चमकता और जगमगाता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वह मेरे नगर की ओर बढ़ते हुए पथिकों को भ्रम की राहों पर भटका देता है।

25

रे बाहर से भले, अन्दर से दुष्ट !

तुम उस स्वच्छ किन्तु कड़वे जल के समान हो जो बाहर से स्फटिक-सा शुद्ध प्रतीत होता है, किन्तु जब दिव्य गुण के परीक्षक के द्वारा उसकी परीक्षा ली जाती है तब उसकी एक बूंद भी स्वीकार्य नहीं होती। हाँ, सूर्य-रश्मियाँ धूल और दर्पण पर समान रूप से पड़ती हैं। किन्तु प्रतिबिम्बन में वे एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं जितने कि पृथ्वी से तारे दूर हैं। बल्कि वह अन्तर इतना अधिक है कि उसे मापा और आंका नहीं जा सकता।

26

हे मेरे कहलाने वाले मित्र !

तनिक विचार कर, क्या तूने कभी यह सुना है कि मित्र और शत्रु एक ही हृदय में रहें ? तो निकाल फेंक उस पराये को, ताकि ‘मित्र’अपने घर में प्रवेश कर सके।

27

हे धूल के पुत्र !

आसमान में और धरती पर जो भी है वह मैंने तुम्हारे लिये बनाया है सिवाय मानव-हृदय के, जिसे मैंने अपने सौन्दर्य और महिमा का निवास स्थल बनाया है, फिर भी तूने मेरे निवास को मेरे अतिरिक्त किसी अन्य को दे दिया है और जब कभी भी मेरी पावनता का प्रकटीकरण अपने घर पहुँचा है तब उसने वहाँ किसी अजनबी को पाया है और तब स्वयं को गृहविहीन महसूस कर तेजी से अपने ‘प्रियतम’के वितान तले लौट आया है; फिर भी, मैंने तेरे इस भेद को छिपाए रखा है और तुझे लज्जित करने की इच्छा नहीं की।

28

हे लालसा के सार !

अनेक सुप्रभात बेला में स्थानरहित देश से मैं तेरे कक्ष तक आया और तुझे अपनी शय्या पर निश्चिन्ततापूर्वक मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के साथ लिप्त अवस्था में पाया। तत्काल ही, चेतना की झलक के समान, मैं स्वर्गिक महिमा के लोक में लौट आया और अपनी शस्य शरणस्थली में पावनता के सहचरों के समक्ष इसकी चर्चा भी नहीं की।

29

हे कृपा-पुत्र !

असारता के अपशिष्ट से, अपनी आज्ञा की माटी से मैंने तुझे अस्तित्व दिया और अस्तित्व में आये प्रत्येक अणु तथा सभी सृजित वस्तुओं के सार तुम्हारे प्रशिक्षण हेतु उपलब्ध कराये। इस प्रकार इसके पूर्व कि तुमने अपनी माँ की कोख से जन्म लिया, मैंने तुम्हारे लिये अमृत सदृश्य दूध के सोते निर्धारित कर दिये, तुम्हारी देखभाल के लिए ममतामयी आँखें दीं और तुम्हें प्रेम करने के लिए हृदय दिये। अपनी प्रेमपूर्ण कृपालुता के कारण ही अपनी करुणा की छांव तले मैंने तुम्हारा लालन-पालन किया और अपनी कृपा और अनुकम्पा के सार के सहारे तुम्हारा सार-सम्भाल किया। इतना सब करने के पीछे मेरा उद्देश्य केवल एक था कि तू मेरे शाश्वत साम्राज्य और अदृश्य उपहारों को पाने के योग्य बन सके। फिर भी, तू असावधान रहा और जब तूने विकास की अवस्था प्राप्त की तब मेरे सभी उपहारों के प्रति उदासीन बन बैठा और स्वयं को अपनी ही व्यर्थ कल्पनाओं में व्यस्त कर लिया और उसी में कुछ इस कदर खो गया कि अपने परम मित्र की राह बिसरा बैठा और उससे विमुख होकर ‘मेरे’ शत्रु की शरण में चला गया।

30

हे संसार के बंधुआ दासो !

अनेक प्रभातों में मेरी प्रेमपूर्ण कृपालुता की बयार तेरे ऊपर से होकर बही है और तुझे लापरवाही की शय्या पर प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न पाया है। तेरे हाल पर विलाप करती हुई वह वहीं लौट आई है जहां से उसका आगमन हुआ था।

31

हे धरती के पुत्र !

तू यदि मुझे चाहे तो मेरे अतिरिक्त किसी अन्य को मत चाह और यदि तू मेरे सौन्दर्य को निरखना चाहे तो अपने नेत्रों को मूंद ले, क्योंकि मेरी इच्छा और मेरे अतिरिक्त किसी अन्य की इच्छा अग्नि और जल के समान एक ही हृदय में एक साथ नहीं रह सकती।

32

हे मित्रवत अपरिचित ! तेरे हृदय के दीप को मुझ महान के शौर्य की भुजा ने प्रदीप्त किया है, स्वार्थ एवं वासना के विरोधी झोकों से उसे न बुझा। तेरी समग्र व्याधियों का निराकरण एकमात्र मेरा सुमिरन है, इसे न भूल। मेरे प्रेम को अपनी पूंजी बना और उसे स्वयं अपनी दृष्टि और अपने जीवन के समान संजो कर रख।

33

हे मेरे बंधु !

मेरी मधुपूर्ण वाणी से उपजे सुमधुर शब्दों को सुन और मिठास झरते मेरे अधरों से, रहस्यमय पावनता के प्रवाह का पान कर। अपने अन्तःकरण की विशुद्ध धरती पर मुझ महान के ईश्वरीय ज्ञान का बीजारोपण कर और उसे विश्वास के जल से सींच, ताकि मेरे ज्ञान तथा विवेक के सम्बुल पुष्प हरे-भरे होकर तेरे हृदय की पवित्र नगरी में लहलहा उठें।

34

हे मेरे स्वर्ग के निवासियों !

प्रेमपूर्ण कृपालुता के करों से मैंने तुम्हारे प्रेम और सौहार्द के नौनिहाल वृक्ष को स्वर्ग की पवित्र वाटिका में रोपा है और अपनी सुकोमल शोभा की हितकर फुहारों से उसका सिंचन किया है। अब जब उसके फल देने का समय आ गया है, तब प्रयत्न करो कि उसकी रक्षा हो सके। कहीं वासना तथा कामना की ज्वाला से तुम भस्म न हो जाओ।

35

हे मेरे मित्रों !

भ्रांति के दीप को बुझा दो और अपने हृदय में दिव्य मार्गदर्शन की चिरंतन मशाल को प्रज्वलित कर लो, क्योंकि अति शीघ्र मानवमात्र के परीक्षक, परम प्रियतम की उपस्थिति में, अन्य कुछ नहीं, मात्र विशुद्धतम गुणों तथा निकलुष पावनता को ही स्वीकार करेंगे।

36

हे धूल के पुत्र !

विवेकवान वे हैं, जो जब तक श्रोता नहीं पाते, नहीं बोलते। जिस प्रकार साकी जब तक आकांक्षी नहीं देखता, अपना प्याला आगे नहीं बढ़ाता और प्रेमी जब तक अपनी प्रियतमा के सौदन्र्य को नहीं निहार लेता तब तक अपने हृदय के तल से गुहार नहीं लगाता। इसलिए हृदय की विशुद्ध भूमि में ज्ञान और विवेक के बीज बोकर उन्हें उस समय तक छिपा कर रख, जब तक कीचड़ और मिट्टी से नहीं बल्कि हृदय की पवित्र भूमि से दिव्यज्ञान के सुमन न खिल उठें।

37

दिव्य पाती की प्रथम पंक्ति में यह अंकित तथा उल्लिखित है और ईश्वर के अभयस्थल में इसे गोपनीय रखा गया है।

हे मेरे सेवक !

जो नाशवान है उसके लिए अनन्त साम्राज्य का परित्याग न कर और लौकिक कामना के लिए स्वर्गिक प्रभुसत्ता न गंवा। यह शाश्वत जीवन की वह सरिता है जो दयावंत की लेखनी के अनन्त निर्झर से प्रवाहमान हुई है। भाग्यशाली हैं वे लोग, जो इसका पान करते हैं।

38

हे चेतना के पुत्र !

अपने पिंजड़े को तोड़कर छिन्न-भिन्न कर दे और प्रेम के ‘हूमा’पक्षी की भांति पवित्रता के व्योम में विचरण कर। निज का परित्याग कर दे और दया की शक्ति से परिपूर्ण होकर स्वर्गिक पावनता के लोक में अनंत आवास कर।

39

हे धूल की संतान !

एक चलायमान दिवस के सुख में संतोष न कर और स्वयं को शाश्वत विश्रांति से वंचित न होने दे। अनंत आनंद की वाटिका का एक नाशवान संसार की मिट्टी के ढेर के लिए सौदा न कर। अपनी कारा से ऊपर उठकर शोभायमान रमणीय मैदानों की ऊँचाइयों की ओर मुखर हो जा और क्षणभंगुर पिंजड़े से परे स्वर्ग की उड़ान भर।

40

हे मेरे सेवक !

इस संसार के बंधनों से स्वयं को मुक्त कर और अहम के कारागार से अपनी आत्मा को विमुक्त कर ले। अपने सुअवसर को हाथ से न निकलने दे, क्योंकि वह तुझे फिर प्राप्त नहीं हागा।

41

हे मेरी सेविका के पूत !

यदि तू अमर साम्राज्य के दर्शन कर ले तो इस क्षणभंगुर संसार से तू जाने के प्रयास करेगा। किन्तु, तुझसे एक को गुप्त रखने और दूसरे को तेरे समक्ष प्रकट करने में एक ऐसा रहस्य निहित है जिसे मात्र शुद्ध हृदय ही समझ सकते हैं।

42

हे मेरे सेवक !

द्वेष से अपने हृदय को विमुक्त कर ले और ईष्र्या से अनभिज्ञ होकर पवित्रता के दिव्य प्रांगण में प्रवेश को प्राप्त हो।

43

हे मेरे मित्रों !

परम ‘मित्र’की शुभ प्रसन्नता के मार्ग पर चलो और यह जान लो कि ‘उसकी’प्रसन्नता अपने प्राणियों की प्रसन्नता में निहित है। अर्थात कोई मनुष्य अपने मित्र की इच्छा के बिना उसके गृह में प्रवेश न करे, अपनी इच्छा को अपने मित्र की इच्छा से श्रेष्ठ न समझे और किसी भी दशा म उसका अनुचित लाभ न ले। इस पर मनन करो, ओ अन्तर्दृष्टि वाले लोगों !

44

ओ मेरे राजसिंहासन के साथी !

कोई बुराई न सुन और कोई बुराई न देख, अपने को पतित न बना, न दुःख के उच्छ्वास ले और न विलाप ही कर। अपशब्द न बोल ताकि स्वयं अपने लिए भी तुझे अपशब्द न सुनने पड़ें। दूसरे के दोषों को बढ़ा-चढ़ा कर न देख, कहीं तुम्हारी अपनी बुराई प्रकाश में न आ जाये। अतः, अपने जीवन के शेष बचे थोड़े दिनों को जो एक उड़ते हुए निमेष से भी कम हैं, अपने संशुद्ध मन, अपने अकलुषित विचारों, अपने विराट हृदय और अपनी पवित्र प्रकृति से सराबोर कर ले, ताकि स्वतंत्र और संतृप्त, तू इस नश्वर ढांचे को त्याग सके और रहस्यमय स्वर्ग में प्रवेश कर अनन्तकाल के लिए शाश्वत लोक में बस जाये।

45

अफसोस ! अफसोस ! हे सांसारिक लालसाओं के प्रेमियों !

बिजली की कौंध-सी चपलता की तरह तुम उस ‘‘परमप्रिय‘‘ मित्र के समीप से गुजर चुके हो और अपने हृदय को शैतानी विचारों में तुमने लीन कर लिया है। अपनी व्यर्थ मोहमाया के समक्ष तुमने घुटने टेक दिये हैं और इसे ही परम सत्य का नाम दिया है। तुम अपनी दृष्टि कंटक की ओर करते हो और कहते हो कि यह पुष्प है। तुमने एक भी निर्मल श्वास नहीं लिया है और न तुम्हारे हृदय की हरियाली से अनासक्ति के समीर का कोई झोंका प्रवाहित हुआ है। परमप्रिय के प्रेमपूर्ण उपदेशों को तुमने झंझावातों में झोंक दिया है और उन्हें अपने हृदय पटल से पूरी तरह मिटा डाला है। तुम चरागाह के पशुओं के समान विचरण कर रहे हो और कामना एवं विलासिता के घेरे के भीतर जीवन शेष कर रहे हो।

46

हे धर्म-पथ के बंधुओं !

परमप्रिय के सुमिरन को भला तुमने क्यों त्याग दिया है और क्यों दूर कर लिया है उसकी पावन उपस्थिति से स्वयं को ? सौन्दर्य का सार उस अनुपम मंडप में है जो महिमा के सिंहासन पर तना है। तुमने स्वयं को व्यर्थ विवादों में उलझा रखा है। पावनता की सुमधुर सुरभि सुवासित हो रही है और कृपालुता की बयार चल रही है, फिर भी तुम सब इनसे वंचित होकर पूरी तरह दुःख में डूबे हुए हो। अफसोस है तेरे लिए और उनके लिए जो तेरी तरह आचरण करते हैं और तेरा अनुसरण करते हैं।

47

हे लालसा की संतानो !

व्यर्थाभिमान के वस्त्र को उतार फेंको और अंहकार के वस्त्र का त्याग करो।

48

उस अदृश्य की लेखनी द्वारा माणिकपत्र पर अंकित तथा अभिलिखित परम पावन पंक्तियों में तीसरी पंक्ति में यह रहस्योद्घाटन किया गया है:

हे बांधवो !

परस्पर सहनशील रहो और हीन वस्तुओं में अनुराग न रखो। अपनी समृद्धि का अहंकार न करा और अनादर में लज्जित न हो। मेरे सौन्दर्य की सौगंध ! समस्त पदार्थों को मैंने धूल से उत्पन्न किया है और पुनः धूल में ही मैं इन्हें लौटा दूंगा।

49

हे धूल की संतानो ! धनिकों को निर्धन की अर्द्धरात्रि की आहों से परिचित कराओ, कहीं प्रमाद उन्हें विनाश के मार्ग पर न पहुंचा दे और उन्हें ‘धन वैभव के वृक्ष’से विहीन न कर दे। दान देना तथा उदार रहना मेरे गुण हैं, कल्याण हो उसका जो स्वयं को मेरे गुणों से अलकृत करता है।

50

हे वासना के मूलस्वरूप !

सारे लोभ को निकाल फेंको और संतोष की कामना करो, क्योंकि लोभी सदैव वंचित है और संतोषी सदैव प्रशंसित और प्रिय है।

51

हे मेरी सेविका के पुत्र !

दरिद्रता में व्याकुल न हो और धन वैभव से आश्वस्त न हो जाओ, क्योंकि दरिद्रता के बाद धनधान्यता का आगमन होता है और धनधान्यता के बाद निर्धनता का। फिर भी, ईश्वर के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं से विहीन हो जाना एक अलौकिक वरदान है। इसकी महत्ता को क्षीण न कर, क्योंकि अंत में यही तुझे उस प्रभु के सामने धनवान बनाएगा। इस प्रकार तुझे इस वचन की सच्चाई ज्ञात हो सकेगी कि ”सत्य ही तुम दरिद्र हो“और ये पावन शब्द ”ईश्वर ही सर्वसंपन्न है“सुप्रभात की कांति के समान प्रेमी के हृदयाकाश के क्षितिज पर उद्भासित हो जायेंगे और इस प्रकार धन-वैभव के सिंहासन पर तू सुरक्षित रहेगा।

52

हे प्रमाद और कामना की सन्तानों !

मेरे शत्रु को तुमने मेरे भवन में प्रवेश दिया है और मेरे मित्र को तुमने निकाल दिया है, क्योंकि तुमने अपने हृदय में मुझसे अलग किसी अन्य के प्रेम को बसाया है। परम मित्र के वचनों पर ध्यान दो और उस महान के स्वर्ग की ओर उन्मुख हो जाओ। सांसारिक मित्र अपने हित के लिए एक-दूसरे से प्रेम करते प्रतीत होते हैं, जबकि सच्चा ‘मित्र’तुम्हारे लिए तुमसे प्रेम करता है और सदा-सर्वदा करता रहेगा, निश्चय ही तुम्हारे मार्गदर्शन हेतु उसने असंख्य यातनायें झेली हैं। ऐसे अनुपम मित्र के प्रति विश्वासघाती न बनो, बल्कि उस तक पहुंचने की शीघ्रता करो। यह है सत्य या वफादारी का सूर्य जो समस्त नामों के स्वामी की लेखनी के क्षितिज से उदित हुआ है। अपनी श्रवणेन्द्रियों को सचेत कर लो जिससे संकटों में सहायक, स्वयं सम्पूर्ण ईश्वर की वाणी तुम सुन सको।

53

हे क्षणभंगुर सम्पत्ति पर अभिमान करने वाले !

तुम यह सत्य जान लो कि आकांक्षी और उसकी आकांक्षा, प्रेमी और उसकी प्रेयसी के बीच धन-सम्पदा एक भारी अवरोध है। कुछ को छोड़कर, धनवान, उस परमप्रिय के दरबार में नहीं पहुंच सकते और न ही संतोष और त्याग के नगर में प्रवेश पा सकते हैं। धन्य है वह मनुष्य, जो धनी होते हुए भी अपनी धन-सम्पदा को न तो अनंत लोक की प्राप्ति में बाधक बनने देता है और न ही उसके कारण अमिट साम्राज्य से वंचित रहता है। परम पावन नाम की सौगंध ! उस धनवान मनुष्य का ओज स्वर्गलोक वासियो को इस प्रकार प्रकाशमय करता है जिस प्रकार सूर्य धरती के लोगों को उद्भासित करता है !

54

हे धरती के धनवानों !

तुम्हारे बीच निर्धन लोग मेरी धरोहर हैं, मेरी धरोहर की तुम रक्षा करो और अपने ही सुख-चैन में लिप्त न रहो।

55

हे वासना के पुत्र !

धन की अपवित्रताओं से स्वयं को निर्मल बना और पूर्ण शांति से अकिंचनता के लोक की ओर अग्रसर हो ताकि अनासक्ति की निर्झरणी से तू अमरता की मदिरा का पान कर सके।

56

हे मेरे पुत्र !

दुर्जनों की संगत पीड़ा बढ़ाती है, जबकि धर्मात्माओं की संगत हृदय-पटल को निर्मल कर देती है। वह, जो परमप्रभु से संसर्ग रखने का आकांक्षी है, उसे चाहिए कि वह प्रभु के प्रियजनों से संसर्ग रखे और वह, जो उसके अमृत वचनों को सुनना चाहता है, उसे चाहिए कि ‘उसके’चुने हुए लोगों के शब्दों पर ध्यान दे।

57

हे धूल के पुत्र !

सावधान ! दुर्जन के साथ न चल और उसके साथ मित्रता की कामना न कर क्योंकि ऐसी संगति हृदय के प्रकाश को नर्क की अग्नि में परिवर्तित कर देती है।

58

हे मेरी सेविका के पुत्र !

यदि तुझे पावन आत्मा की कृपा की कामना है तो धर्मात्मा की संगति कर क्योंकि उसने दिव्य साकी के हाथों से अनन्त जीवन का प्याला पी लिया है और वास्तविक प्रभात के समान, वह निश्चय ही मृतकों के हृदयों को गतिमान एवं प्रकाशित कर देता है।

59

हे असावधानो !

यह न सोचो कि तुम्हारे हृदय के रहस्य मुझ महान से गुप्त हैं, अपितु तुम यह सुनिश्चित रूप से समझ लो कि वे स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण हैं और परम-पावन के समक्ष पूर्ण रूप से प्रभासित हैं।

60

हे मित्रों !

सत्य ही मैं कहता हूँ, जो कुछ भी तुमने अपने हृदय में छिपा रखा है, वह दिन के उजाले के समान हमारे समक्ष प्रकट है, किन्तु यदि वह अप्रकट है तो हमारी महानता और अनुकम्पा के कारण, न कि तुम्हारी पात्रता के कारण।

61

हे मनुष्य के पुत्र !

अपनी दया के अथाह महासागर में से ओस की एक बूंद मैंने संसार के लोगों पर गिरा दी है, परन्तु फिर भी उनकी ओर उन्मुख होता हुआ मुझे एक भी न मिला क्योंकि प्रत्येक मानव, एकता की दिव्य सुरा से विमुख होकर अपवित्रता के तलछटों में लिप्त है और पार्थिव प्याले से संतुष्ट होकर अमर सौन्दर्य के अमृत-पात्र को किनारे कर रहा है। जिससे वह संतुष्ट है वह वस्तु अधम है।

62

हे धूल के पुत्र !

परमप्रिय की अविनाशी अनुपम सुरा से अपनी दृष्टि न फेर और उन्हें दूषित तथा नश्वर तलछटों के लिए न खोल। दिव्य साकी से अमर जीवन का प्याला ग्रहण कर ताकि तू समग्र बुद्धि का पात्र बन सके और अदृश्य के व्योम से पुकारती हुई दिव्य ध्वनि को ध्यानपूर्वक सुनने का सौभाग्य प्राप्त कर सके। पुरजोर आवाज में कह दे, ओ निम्न आकांक्षा वालों! नष्ट और लुप्त हो जाने वाले जल के लिए मुझ महान के पवित्र तथा अमृत रूपी मधु से तुमने स्वयं को विमुख क्यों कर लिया है?

63

हे दुनिया के लोगों !

वस्तुतः यह जान लो कि एक अज्ञात संकट तुम्हारा पीछा कर रहा है और एक गंभीर प्रतिशोध तुम्हारी प्रतीक्षा में है। यह नहीं समझो कि तुम्हारे कृत्य मुझ महान की दृष्टि से ओझल हो चुके हैं। मेरे सौंदर्य की सौगंध! तुम्हारे सभी कृत्यों को मुझ महान की लेखनी ने अमिट पाती पर स्पष्ट अक्षरों में अंकित कर रखा है।

64

हे धरती के अत्याचारियों !

अत्याचार से अपने हाथों को समेट लो, क्योंकि मैंने संकल्प लिया है कि किसी भी मनुष्य के अन्याय को मैं क्षमा नहीं करूंगा। यह मेरी संविदा है जिसकी मैंने संरक्षित पाती में अटल आज्ञा दी है और जिस पर मैंने अपनी महानता की मुहर अंकित कर दी है।

65

हे विद्रोहियों !

मेरी सहनशीलता ने तुम्हें उदंड और मेरी लम्बी पीड़ा ने तुम्हें प्रमादी बना दिया है, इतना अधिक, कि लालसाओं के सरपट घोड़ों पर सवार होकर तुम विनाश के उन मार्गों पर हो जो महानाश तक ले जाते हैं। क्या तुमने मुझे असावधान समझ लिया है, या यह समझ लिया है कि मैं अनभिज्ञ हूँ?

66

हे प्रवासियों !

मैंने यह जिह्वा मेरे स्मरण के लिए बनाई है, उसे निन्दा द्वारा अपवित्र न करो। यदि तुम पर स्वार्थ की अग्नि प्रबल हो तो अपने ही दोषों को याद करो न कि मेरे प्राणियों के दोषों को, क्योंकि तुममें से हर एक दूसरे से अधिक स्वयं के बारे में जानकारी रखता है।

67

हे मोहमाया की संतान !

निश्चित रूप में जान लो कि अनन्त पवित्रता के क्षितिज पर जब देदीप्यमान प्रभात की आभा खिल उठेगी तो रात्रि के अंधेरे में किए गए सभी शैतानी रहस्य तथा कर्म खुले और प्रत्यक्ष रूप में संसार के लोगों के सामने प्रकट हो जाएंगे।

68

हे मिट्टी से उपजे घास-फूस !

क्योंकर तुमने अपने कलुषित हाथों से पहले अपने ही परिधान का स्पर्श नहीं किया और क्यों लालसा एवं विषय-वासना से अपवित्र हृदय से तुम मेरे तादात्मय की प्राप्ति और मुझ महान के पवित्र लोक में प्रवेश करने की अभिलाषा रखते हो?

69

हे मनु की संतानो !

पवित्र शब्द तथा शुद्ध एवं नेक कर्म दिव्य महिमा के स्वर्ग की ओर जाते हैं। प्रयत्न करो कि तुम्हारे कर्म, स्वार्थ और पाखंड की धूल से मुक्त होकर, महिमा के दरबार में अनुग्रह को प्राप्त हो, क्योंकि सर्वस्तुत्य ईश्वर की उपस्थिति में मानवजाति के परीक्षक सम्पूर्ण गुण और अकलुषित पावन कर्मों के अतिरिक्त कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। यह विवेक एवं ईश्वरीय रहस्य का वह सूरज है जो दिव्य इच्छा के क्षितिज के ऊपर उद्भासित हुआ है। सौभाग्यशाली हैं वे जो इस दिशा में उन्मुख हुए हैं।

70

हे सांसारिकता के पुत्र !

अस्तित्व का जगत अत्यन्त मनोहारी है, काश तू उसे प्राप्त कर सकता। अनन्तता का साम्राज्य अत्यन्त गौरवपूर्ण है, यदि तू नश्वरता के लोक के आगे बढ़े। पवित्रता का परमानन्द सुमधुर है, यदि तू दिव्य ”युवक” के हाथों से रहस्य की प्याली पी ले; यदि तू इस पद को प्राप्त करे तो विनाश और जरा-मरण से तथा कष्टों एवं पापों से तुझे मुक्ति मिल जाएगी।

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ओ मेरे मित्रों !

जामान की पवित्र स्थली में स्थित ‘पाराण’नामक पर्वत पर जिस संविदा के अन्तर्गत तुम मेरे साथ वचनबद्ध हुए थे, उसे याद करो। दिव्य गण तथा अमर पुरी के वासियों को मैंने उसका साक्षी बनाया है, तब भी अब मुझे एक भी ऐसा प्राणी नहीं दिखता है जो उस वचन के प्रति निष्ठावान हो। निश्चय ही गर्व और द्रोह ने उसे हृदयों से इस तरह मिटा दिया है कि उस बात का चिह्न मात्र भी शेष नहीं रहा है। किन्तु, यह जानते हुए भी मैं प्रतीक्षा करता रहा और मैंने उसका भेद नहीं खोला।

72

हे मेरे सेवक !

तू सुघड़ चमचमाती तलवार की भांति है जो अपनी म्यान के अंधकार में छिपी पड़ी है और उसका मूल्य कलाविद के ज्ञान से गुप्त है। अतः, अहं और लालसाओं की अपनी म्यान से बाहर निकल आ ताकि तेरी बहुमूल्यता समस्त संसार के समक्ष स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष हो सके।

73

हे मेरे मित्र !

तू मेरी पावनता के स्वर्ग का सूर्य है, संसार की अपवित्रताओं से अपनी कांति को ग्रसित न होने दे। प्रमाद के पर्दे को चीर दे, ताकि बादलों के भीतर से बाहर प्रकट होकर तू जगमगाता हुआ सभी पदार्थों को जीवन के वस्त्रों से अलंकृत कर सके।

74

हे व्यर्थाभिमान की संतानों !

एक चलायमान साम्राज्य के लिए तुमने मुझ महान के कभी न नष्ट होने वाले साम्राज्य का परित्याग कर दिया है और संसार के भड़कीले वस्त्रों से स्वयं को अलंकृत कर लिया है। मेरे सौन्दर्य की सौगंध ! मैं धूल की चादर के अंदर सबको समेट लूंगा और शेष सभी रंगों को मिटा डालूंगा, सिवाय उनके जो मेरे रंग में रंगे जा चुके हैं और अन्य सभी रंगों से मुक्त हो चुके हैं।

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हे प्रमाद की संतान!

नाशवान साम्राज्य में मन न लगाओ और उसमें आनन्द-मग्न न रहो। तुम उस असावधान पक्षी के समान हो जो बड़े विश्वास के साथ डाल पर गाता रहता है और जिसे अचानक ”मृत्यु का आखेटक” धूल पर फेंक देता है। फिर वह सुरीला राग, आकृति और रंग-रूप बिना कोई चिह्न छोड़े लुप्त हो जाता है, इस पर ध्यान दो, रे लालसा के दासों !

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हे मेरी सेविका के पुत्र !

सर्वदा शब्दों के माध्यम से ही मार्गदर्शन दिया जाता था और अब वह कर्मों के द्वारा किया जाता है। प्रत्येक को चाहिए कि ऐसे कर्मों का प्रदर्शन करे जो शुद्ध एवं पवित्र हों। क्योंकि शब्द सर्वसामान्य की सम्पत्ति होते हैं, जबकि इस प्रकार के कर्म केवल ‘हमारे’प्रियजनों की विशेषता हैं। अतः स्वयं को अपने कर्मों द्वारा विशिष्ट बनाने हेतु हृदय और आत्मा सहित जुट पड़ो। इस पवित्र एवं ज्वलंत अभिलेखों में हम तुझे यह परामर्श देते हैं।

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हे न्याय के पुत्र !

रात्रि बेला में अविनाशी ईश्वर का सौन्दर्य निष्ठा की रत्नजटित ऊँचाइयों से कल्पवृक्ष (सद्रतुल-मुन्तहा) की ओर लौट आया और ऐसे ऊँचे स्वर मंे चीत्कार उठा कि स्वर्गलोक के देवदूत और परलोक के निवासी भी ‘उसका’ रुदन सुन विलाप करने लगे। इस पर यह पूछा गया, ”यह रुदन और विलाप क्यो ?“ उसने उत्तर दिया: जैसी मुझे आज्ञा दी गई थी, मैं आस्था के पर्वत पर प्रतीक्षा करता रहा, लेकिन पृथ्वीवासियों के बीच निष्ठा की सुरभि नहीं मिली। तब मुझे लौटने का आदेश हुआ और मैंने देखा, हाय ! पावनता के कपोत पृथ्वी के श्वानों के जबड़ों में जकड़े हुए थे। तब ही स्वर्ग की ‘सेविका’अपनी सम्पूर्ण तेजोमयता के साथ अपने रहस्यमय प्रासाद से प्रभासित हुई और उसने उनके नाम पूछे। एक के अतिरिक्त सभी नाम बतला दिये गये। जिस पर दिव्य लोक के वासी अपनी महिमा के निवास से दौड़ आये और द्वितीयाक्षर का उच्चार गया। तब सब-के-सब मूर्छित हो गिर पड़े और धूल-धूसरित हो गये। उसी समय समाधि के अन्दर से एक स्वर उभरा, ”यहीं तक, आगे नहीं।“ सत्य ही, हम इसके साक्षी हैं जो उन्होंने किया है और जो वे अब कर रहे हैं, हम उसके भी साक्षी हैं।

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हे मेरी सेविका के पुत्र !

सर्वदयालु की जिह्वा से प्रवाहमान दिव्य रहस्य की धारा का जी भर कर पान कर और उपदेशों के नव वसन्त में ज्ञान के युगबोधक के अनावृत तेज का दर्शन कर। हृदय की पवित्र भूमि में मुझ महान के दिव्य ज्ञान के बीज बो और उन्हें विश्वास के जल से सींच, ताकि ज्ञान और विवेक के सम्बल-पुष्प हृदय की पवित्र नगरी से नए और हरे-भरे रूप में लहलहा उठें।

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ओ लालसा के पुत्र !

भला कब तक तू मोह-माया के अपने संसार में विचरण करता रहेगा? मैंने तुझे पंख इसलिये प्रदान कये हैं कि तू दिव्य पवित्रता के साम्राज्य में उड़ सके न कि तू उनके शैतानी मायाजाल पर मंडराता रहे। मैंने तुझे कंघा इसलिए दिया है कि तू मेरे काले केश का विन्यास करे, इसलिये नहीं कि उससे तू मेरे कंठ को ही घायल करने लगे।

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हे मेरे सेवको !

तुम मेरे उद्यान के वृक्ष हो। तुम्हारे लिए आवश्यक है कि उत्तम और विलक्षण फल तुम उत्पन्न करो ताकि उनसे तुम स्वयं तथा अन्य लाभ पा सकें। इसलिए प्रत्येक के लिए यह आवश्यक है कि शिल्प तथा व्यवसायों में उद्यमशील रहे, क्योंकि इसी में धन-धान्यता का रहस्य निहित है। ओ विवेकवानों ! परिणाम साधनों पर निर्भर करते हैं और ईश्वर की कृपालुता तुम्हारे लिए सर्वसम्पूर्ण है। वे वृक्ष, जो फल नहीं देते, मात्र अग्नि को अर्पित कर देने के योग्य होते हैं और रहेंगे।

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हे मेरे सेवक !

निम्नतम श्रेणी के मनुष्य वे हैं जो धरती पर कोई भी सुफल नहीं उपजाते हैं। वस्तुतः ये लोग मृतकों में गिने जाते हैं। ईश्वर की दृष्टि में आलसी और बेकार लोगों से कहीं बेहतर हैं मृतक।

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हे मेरे सेवक ! मनुष्यों में सर्वोत्तम वे हैं जो अपने व्यवसाय द्वारा जीविका अर्जित करते हैं और समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी ईश्वर के प्रेम के कारण अपने और अपने सम्बन्धियों पर उसे खर्च करते हैं।

जो रहस्यमयी और अद्भुत ‘परिणीता’शब्दों के पर्दे के पीछे छिपी थी वह ईश्वर की कृपा तथा उसकी दिव्य अनुकम्पा से प्रकट कर दी गई है और उसके मुखमंडल की कांति चारों ओर फैल रही है। हे मित्रों! मैं साक्षी देता हूँ कि अनुकम्पा पूर्ण हो चुकी है, वचन पूरे किये जा चुके हैं, प्रमाण स्पष्ट है और साक्ष्य स्थापित हो चुका है। अब देखना यह है कि अनासक्ति की राह में तुम्हारे प्रयत्न क्या रहस्य खोलते हैं। अपनी सम्पूर्णता में दिव्य अनुकम्पा तुम्हारे और स्वर्ग तथा पृथ्वी के सभी प्राणियों के ऊपर बरसा दी गई है। ईश्वर का गुणगान हो, जो सभी लोकों का स्वामी है।

बहाउल्लाह

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