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वह दाता और उदार है!
स्तुति हो ईश्वर की, जो पुरातन, चिरन्तन, निर्विकार, शाश्वत है। वह जो स्वयं अपने अस्तित्व का साक्षी है कि वह सत्य ही एकाकी, एकल, अबाधित, उदात्त है। हम साक्षी हैं कि उसके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, हम उसकी एकमेवता को स्वीकारते हैं, उसकी अखण्डता पर विश्वास करते हैं। उसने सदैव ही अगम्य उच्च शिखरों पर निवास किया है, वह स्वयं के अतिरिक्त किसी के भी उल्लेख से पवित्र तथा स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी के भी वर्णन से परे है।
और जब उसने मनुष्यों पर कृपा और उपकार व्यक्त करने और संसार को सुव्यवस्थित करने की इच्छा की, उसने प्रथाओं को प्रकट किया और विधानों की रचना की, उसने उसमें विवाह के विधान की स्थापना की और इसे कल्याण और मुक्ति के दुर्ग के रूप में बनाया और जो परम पावन पुस्तक में पवित्रता के आकाश से उतरा था उसका हमें आदेश दिया। वह कहता है, उसकी महिमा महान है! हे लोगो! “विवाह के बन्धन में बंधो ताकि तुम उसे जन्म दे सको जो मेरे सेवकों के बीच मेरा उल्लेख करेगा। यह तुम्हारे लिए मेरा आदेश है, अपनी सहायता के रूप में दृढ़ता से इसको थाम लो।
- Bahá'u'lláh