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(जब भी तुम परामर्श के लिये सभाकक्ष में प्रवेश करो, तो ईश्वर के प्रेम से धड़कते हृदय और मात्र उसके स्मरण के अतिरिक्त अन्य सभी कुछ से मुक्त हुई जिह्वा से इस प्रार्थना का पाठ करो, जिससे कि वह सर्वशक्तिमान सर्वोच्च विजय प्राप्त कराने में अनुग्रहपूर्वक तुम्हारी सहायता करे।)
हे तू दिव्य साम्राज्य के स्वामी! हमारे शरीर यहाँ अवश्य एकत्र हैं, लेकिन हम मंत्रमुग्ध हैं, तुम्हारे प्रेम ने हमारे मन-प्राण को हर लिया है; हम तेरे देदीप्यमान मुखड़े की किरणों से आनंदित हो उठे हैं। भले ही हम दुर्बल हैं, किन्तु तेरे सामर्थ्य और शक्ति के प्रकटन की प्रतीक्षा करते हैं। भले ही हम दरिद्र हैं, सम्पत्ति और साधन से हैं हीन, फिर भी हम तेरे दिव्य साम्राज्य की निधियों से समृद्धि पाते हैं। भले ही हम हैं बूंद मात्र है, फिर भी तेरे महासिंधु की अतल गहराइयों से हम अपना भाग ग्रहण करते हैं! हम धूलकण मात्र हैं, फिर भी, तेरे सूर्य की भव्य महिमा से कांति पाते हैं। हे पालनहार ईश्वर! अपनी सहायता भेज, ताकि यहाँ एकत्रित प्रत्येक व्यक्ति एक प्रकाशित दीप बन जाये, हर एक आकर्षण का केन्द्रबिन्दु और तेरे दिव्य प्रांगण में पुकार लगाने वाला हरकारा बन जाये, ताकि हम इस अधम लोक को तेरे स्वर्ग का दर्पण बना सकें।
- `Abdu'l-Bahá