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ईश्वर के समस्त मित्रों को...यथासम्भव दान देना चाहिये, उनके द्वारा समर्पित राशि, चाहे कितनी भी अल्प क्यों न हो। ईश्वर किसी भी आत्मा पर उसकी क्षमता से अधिक भार नहीं डालता। ऐसे दान सभी केन्द्रों एवं समस्त अनुयायियों से आने चाहिये...”हे ईश्वर के मित्रों ! तुम आश्वस्त रहो कि इन योगदानों के बदले तुम्हारी खेती-बाड़ी, तुम्हारे उद्योग और व्यापार को सुंदर उपहारों और दानों का कई गुना आशीर्वाद प्राप्त होगा। निःसंदेह जो सद्कर्म करता है, पुरस्कार में वह दस गुना प्राप्त करेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवंत स्वामी उन्हें अत्यधिक सम्पुष्टि प्रदान करता है, जो उसके पथ में अपनी सम्पदा व्यय करते हैं।“
- `Abdu'l-Bahá