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हे स्वामी! इस सर्वमहान धर्मकाल में माता-पिता की ओर से संतानों द्वारा की गई प्रार्थना को तू स्वीकार करता हैं। यह इस धर्मकाल के विशेष अनन्त आशीषों में एक है। अतः, हे कृपालु स्वामी! अपनी एकमेवता की देहरी पर अपने इस सेवक की विनती स्वीकार कर और अपनी अनुकम्पा के महासागर में इसके पिता को निमग्न कर दे, क्योंकि यह पुत्र तेरी सेवा करने के लिये उठ खड़ा हुआ है और तेरे प्रेम के पथ पर प्रति क्षण प्रयत्नशील है। सत्य ही, तू दाता, क्षमादाता और कृपालु है।
- `Abdu'l-Bahá