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हे मेरे स्वामी, मेरे ईश्वर! विपत्ति में मेरे आश्रय! आपदा में मेरे ढ़ाल और मेरे शरणस्थल! आवश्यकता के समय मेरे आश्रय और शरण! एकाकीपन में मेरे सखा, वेदना में मेरी सांत्वना और अकेलेपन में मेरे एक स्नेहिल मित्र, मेरे दुःखों की पीड़ा हरने वाले और मेरे पापों के क्षमाकर्ता!
मैं पूरी तरह तेरी ओर उन्मुख हूँ और अपने समर्पित हृदय से, अपनी जिह्वा से तुझसे अत्यन्त विनीत भाव से याचना करता हूँ कि मेरी उस सबसे रक्षा कर जो तेरी इच्छा के विरूद्ध हैं, तेरी दिव्य एकता के चक्र में, और मुझे उन सभी मलिनता से निर्मल कर और तेरे निष्कलंक और शुद्ध कृपा के वृक्ष की छाँव पा सकने में बाधक है ताकि मैं निष्कलुष, निष्पाप रह सकूँ।
हे स्वामी निर्बल पर, दया कर! रोगी को स्वस्थ कर और अतृप्त को तृप्त कर। उस हृदय को प्रसन्न कर जिसमें तेरे प्रेम की ज्वाला सुलगती हो, उसे अपने दिव्य प्रेम की लौ और चेतना से प्रदीप्त कर।
दिव्य एकता के वितानों को अपनी पावनता के परिधान से सुसज्जित कर और अपनी कृपादृष्टि का ताज मुझे पहना।
मेरे मुखड़े को अपनी कृपा के प्रभामण्डल से उद्भासित कर और अपनी इस पावन देहरी की सेवा करने में कृपापूर्वक मेरी सहायता कर।
मेरे हृदय को अपने प्रणियों के प्रेम से सराबोर कर दे ताकि मैं तेरी दया का चिन्ह, तेरे अनुग्रह का प्रतीक और तेरे प्रियजनों में स्नेह-भावना बढ़ाने वाला बन जाऊँ, तेरे प्रति समर्पित हो तेरा ही स्मरण करूँ, अपने अहम् को भूलकर जो कुछ तेरा है उसके प्रति सदा सजग रहूँ।
हे ईश्वर, मेरे ईश्वर ! अपनी अनुग्रह और क्षमा के पवन-झकोरों को मुझ तक आने से न रोक और मुझे अपनी सहायता और कृपा के स्रोतों से वंचित न कर।
अपनी सुरक्षा के पंखों के सहारे मुझे नीड़ बनाने दे और मुझ पर अपने सर्वरक्षक नेत्र की कृपादृष्टि डाल।
मेरी जिह्वा को जड़ता से मुक्त कर कि तेरे नाम की स्तुति कर सकूँ, ताकि मेरी वाणी विराट सभाओं में उच्च स्वर में गुंजायमान हो और मेरे होठों से तेरी स्तुति का प्रबल प्रवाह बह निकले।
तू ही समस्त सत्य में, अनुकम्पामय, महिमावंत, समर्थ और सर्वशक्तिशाली है।
- `Abdu'l-Bahá