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”बहाई विवाह दो पक्षों के बीच मृदुल मिलन और स्नेहपूर्ण सम्बन्ध है, लेकिन उन्हें अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिये और एक दूसरे के चरित्र से सुपरिचित हो जाना चाहिये। एक सुदृढ़ संविदा द्वारा यह चिरंतन बंधन संरक्षित कर लिया जाना चाहिये और उद्देश्य होना चाहिये मधुर सम्बन्ध, साहचर्य और एकता तथा अनन्त जीवन को प्राप्त करना।“
”...एक विवाहित जोड़े का जीवन आसमान के फरिश्तों की भाँति होना चाहिये - ख़ुशियों से भरा और आध्यात्मिक आनन्द से परिपूर्ण, एकता का प्रतीक और मित्रवत् - मानसिक और दैहिक मित्रता...। उनके मत और विचार सत्य के सूर्य की किरणों के समान और आसमान के चमकते सितारों की प्रखरता लिये हों। सहभागिता और समरसता के वृक्ष की टहनियों पर मधुर गान गुंजित करते पक्षियों की भाँति उनका जीवन हो। उन्हें निरन्तर आनन्द से उल्लसित होना चाहिये और दूसरों के हृदयों को प्रसन्नता देने का साधन बनना चाहिये। उन्हें अपने संगी साथियों के समक्ष एक उदाहरण बनना चाहिये, एक-दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम और वफ़ादारी रखनी चाहिये और अपने बच्चों को कुछ इस प्रकार शिक्षित करना चाहिये कि वे अपने परिवार का नाम रौशन करें।“
विवाह की प्रतिज्ञा परम पावन पुस्तक ”किताब-ए-अक़दस“ में वर्णित वह श्लोक है जो वर और वधू द्वारा बारी-बारी से वैसे दो गवाहों की उपस्थिति में पढ़ी जानी चाहिये जो आध्यात्मिक सभा को स्वीकार्य हों। विवाह की प्रतिज्ञा इस प्रकार है:
”हम, सत्य ही, ईश्वर की इच्छा का अनुपालन करेंगे।“
- `Abdu'l-Bahá