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वह ईश्वर है! अद्वितीय स्वामी है!
अपने शक्तिसम्पन्न विवेक से तूने मानवजाति के लिये विवाह का विधान किया है कि इस लोक में एक के बाद एक मानव पीढ़ियाँ बनी रहें और जब तक इस लोक का अस्तित्व है तब तक तेरी एकमेवता की पावन देहरी पर तेरी सेवा और उपासना, तेरी स्तुति और महिमागान में वे स्वयं को व्यस्त रखें। ”मैंने आत्माओं और मनुष्यों की सृष्टि नहीं की है बल्कि अपने उपासक सृजित किये हैं“। अतः हे ईश्वर! तू अपने प्रेम के घौंसले में इन दो पक्षियों का विवाह अपनी दया के स्वर्ग में सम्पन्न कर और इन्हें अनन्त कृपा को आकर्षित करने का साधन बना जिससे प्रेम के इन दो ”सागरों“ के मिलन से कोमलता की एक लहर उमड़ सके और जीवन के तट पर ये पावनता और श्रेष्ठता के मोती बिखेर सकें। ”उसने दो सागरों को उन्मुक्त कर दिया है ताकि वे एक दूसरे से मिल सकें: उनके बीच एक मर्यादा है जिसका वे उल्लंघन न करें। अब अपने स्वामी की कृपा के सागरों में से तू किसको अस्वीकार करेगा? प्रत्येक से वह महानतर और लघुतर मोती उत्पन्न करता है।“
हे तू कृपालु स्वामी! इस विवाह को तू मूंगे और मोती उत्पन्न करने का साधन बना। तू सत्य ही सर्वशक्तिशाली, सर्वमहान और सदा क्षमाशील है।
- `Abdu'l-Bahá