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हे ईश्वर, मेरे ईश्वर, मैं कैसे निद्रा का वरण कर सकता हूँ, जबकि तेरे लिये व्यग्र नेत्र तुझसे वियोग के कारण निद्राविहीन हैं और कैसे मैं विश्राम के लिये लेट सकता हूँ जबकि तेरे प्रेमियों की आत्माएँ तेरे सान्निध्य से दूरी के कारण अति व्याकुल हैं? मैंने, हे मेरे स्वामी, अपनी चेतना और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को तेरी सामर्थ्य और तेरी सुरक्षा के दाहिने हाथ में सौंप दिया है और मैं तेरी शक्ति के प्रताप से ही अपना सिर तकिये पर रखता हूँ और तेरी इच्छा और तेरी सुप्रसन्नता के अनुसार ही इसे ऊपर उठाता हूँ। तू सत्य ही, सुरक्षा प्रदान करने वाला, सर्वशक्तिमंत, परम बलशाली है।
तेरी सामर्थ्य की सौगन्ध! मैं चाहे निद्रा में रहूँ अथवा जाग्रत अवस्था में, जो कुछ तू चाहता है उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहता हूँ। मैं तेरा सेवक हूँ और तेरे हाथों में हूँ। जिससे तेरी सुप्रसन्नता की सुरभि का प्रसार हो वैसा ही करने में कृपापूर्वक मेरी सहायता कर। तू सत्य ही, मेरी आशा और उन सबकी आशा है जो तेरे निकट पहुँचने का सुख पाते हैं। स्तुति हो तेरी; हे अखिल लोकों के स्वामी्।
- Bahá'u'lláh