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स्तुति हो तेरी, हे स्वामी, मेरे ईश्वर! मैं तुझसे याचना करता हूँ तेरे उस नाम से, जिसे किसी ने भी उचित रूप से नहीं पहचाना है और जिसके आशय की थाह कोई नहीं पा सकता है। मैं प्रार्थना करता हूँ तेरे उस नाम से, जो तेरे प्राकट्य का निर्झर-स्रोतऔर तेरे चिन्हों का अरुणोदय है कि मेरे हृदय को अपने स्मरण तथा अपने प्रेम का पात्र बना। तब उसे अपने विशाल महासागर में इस प्रकार निमग्न कर दे कि उससे तेरी प्रज्ञा, तेरी महिमा तथा तेरी स्तुति की जीवंत धारायें प्रवाहित हो उठें।
मेरी देह के अंग-प्रत्यंग तेरी एकता को प्रमाणित करते हैं और मेरे सिर के बाल तेरी प्रभुसत्ता तथा सामर्थ्य की घोषणा करते हैं। मैं, अंकिचन, अपने अस्तित्व को नकार कर तेरी महिमा के द्वार पर खड़ा हुआ हूँ और मैंने तेरे आंचल के छोर को दृढ़ता से थाम लिया है और तेरे उपहार के क्षितिज पर अपनी आँखें टिका ली हैं।
मेरे लिये, हे मेरे ईश्वर! वह नियत कर जो तेरी भव्यता की महानता के अनुरूप हो। अपनी शक्तिदायिनी अनुकम्पा द्वारा मेरी सहायता कर कि मैं तेरे धर्म का ऐसे संदेश दूँ कि जिससे मृतप्राय जन भी तत्क्षण उठ खड़े हों और तुझमें विश्वास प्रकट करके तेरे प्राकट्य के उदयस्थल तथा तेरे धर्म की ओर अपनी दृष्टि स्थिर कर, दौड़ पड़ें।
तू वस्तुतः सर्वशक्तिमान्, सर्वोच्च, सर्वज्ञाता तथा सर्वप्रज्ञ है।
- Bahá'u'lláh