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(पर्वत, मरुभूमि, समतल, अथवा समुद्र की राह जो कोई भी शिक्षण के उद्देश्य से भ्रमण कर रहा हो, उसे यह प्रार्थना करनी चाहिये।)
हे ईश्वर! हे मेरे ईश्वर! तू मेरी दुर्बलता, दीनता और विनम्रता को देखता है, फिर भी तेरी शक्ति और सामर्थ्य में भरोसा रखते हुए, मैंने तुझमें विश्वास किया है और तेरे सेवकों के मध्य तेरी शिक्षाओं के प्रसार के लिये मैं उठ खड़ा हुआ हूँ।
हे स्वामी, मैं एक पंख टूटा पक्षी हूँ और तेरे असीम अंतरिक्ष में उड़ान भरना चाहता हूँ। तेरी अनुकम्पा और कृपा, तेरी सम्पुष्टि और सहायता के बिना मेरे लिये ऐसा करना भला कैसे सम्भव होगा?
हे ईश्वर! मेरी दुर्बलता पर दया कर और अपनी सामर्थ्य की शक्ति मुझे दान दे। हे स्वामिन्! यदि पावन चेतना के उच्छ्वास सर्वाधिक निर्बल प्राणियों को भी सम्पुष्टि प्रदान कर दें तो वह जो भी चाहेगा प्राप्त कर लेगा, जो भी कामना करेगा उसे पा लेगा। निश्चय ही तूने पहले भी अपने सेवकों की सहायता की है। वे दुर्बलतम् प्राणी थे, तेरे अकिंचन सेवक और धरती पर निवास करने वालों में निरीहतम थे, लेकिन तेरी कृपा और शक्ति के द्वारा उन्होंने उनसे भी ऊँचा स्थान पा लिया, जो मानवजाति के बीच अत्यन्त प्रतापशाली और प्रतिष्ठित माने जाते थे। वे पहले पतंगे समान थे, शाही बाज बन गये, वे पतली जलधारा के समान थे, बन गये समुद्र से विशाल, क्योंकि तेरी कृपा के सहारे ही वे मार्गदर्शन के क्षितिज के जगमगाते सितारे बन गये, अमरता की गुलाब वाटिका के चहकते पंछी बन गये, ज्ञान और विवेक के जंगलों के दहाड़ते सिंह बन गये और महासागरों में तैरते महामत्स्य बन गये।
निश्चय ही तू करुणामय, शक्तिसम्पन्न, सार्मथ्यशाली और दयालुओं में सर्वाधिक दयालु है।
- `Abdu'l-Bahá