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स्तुति हो तेरे नाम की, हे स्वामी, मेरे ईश्वर! तू वह है जिसकी सभी वस्तुएँ आराधना करती हैं, जो किसी की भी आराधना नहीं करता, जो सबका स्वामी है, जो किसी के अधीन नहीं है, जो सबका ज्ञाता है और जो किसी को भी ज्ञात नहीं है। तूने मनुष्यों के मध्य अपनी पहचान करानी चाही थी इसलिये अपने मुख से निकले एक शब्द से तूने सृष्टि को अस्तित्व दिया था, ब्रह्माण्ड को स्वरूप दिया था। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, स्वरूपदाता, स्रष्टा, सामर्थ्यवान्, सर्वशक्तिवान्। तेरी इच्छा के क्षितिज पर प्रकाशमान इस एक शब्द के माध्यम से मैं तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे उस जीवन-जल को ग्रहण करने के योग्य बना जिसके द्वारा तूने अपने प्रियजनों के हृदयों को अनुप्रणित और आत्माओं को चैतन्य किया है; ताकि मैं हर समय प्रत्येक परिस्थिति में पूर्णतया तेरी ही ओर उन्मुख रहूँ। तू शक्ति, महिमा और कृपा का ईश्वर है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू सर्वोच्च शासक, महिमावंत, सर्वदर्शी है।
- Bahá'u'lláh