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परमोच्च ईश्वर के नाम से! तू महिमावंत और प्रशंसित, सर्वशक्तिमंत है। तू वह है जिसके ज्ञान के समक्ष ज्ञानीजन भी नगण्य दिखते हैं, पराजित हो जाते हैं, जिसके ज्ञान के समक्ष विद्वान भी अपनी अज्ञानता स्वीकारते हैं, जिसकी सामर्थ्य के समक्ष धनवान भी अपनी निर्धनता की साक्षी देते हैं, जिसके प्रकाश के समक्ष प्रज्ञावान भी अंधकार में खो जाते हैं, जिसके ज्ञान के मंदिर की ओर समस्त ज्ञान और समस्त बोध का सार उन्मुख होता है और जिसकी उपस्थिति के अभयस्थल के चतुर्दिक समस्त मानवजाति की आत्माएँ परिक्रमा करती हैं।
तब मैं भला कैसे तेरे उस सारतत्व का उल्लेख और महिमा गान कर सकता हूँ जिसको समझने में विद्वान और ज्ञानीजन भी असफल रहे हैं, क्योंकि बिना समझे कोई भी मनुष्य उसकी महिमा गान नहीं कर सकता, न ही वह उसका वर्णन कर सकता है जहाँ तक वह पहुँच नहीं पाया है, जबकि तू तो शाश्वतकाल से अगम्य और अगोचर रहा है। भले ही मैं तेरी महिमा के आकाश और तेरे ज्ञान के साम्राज्य की ऊँचाई तक उड़ान भरने में अशक्त हूँ, लेकिन मैं तेरी उन कृतियों का वर्णन कर सकता हूँ, जो तेरे शिल्प की कथा कहते हैं। तेरी महिमा की सौगंध! हे समस्त हृदयों के परम प्रियतम्! मात्र तू ही मेरे आकुल प्राणों की वेदना शांत कर सकता है। यदि आकाश और धरती के सभी निवासी मिलकर भी तेरे चिन्हों के उस सूक्ष्मतम् अंश की महिमा का गान करने का प्रयास करें जिसके द्वारा तूने स्वयं को प्रकट किया है, तब भी वे असफल रहेंगे, फिर तेरे पावन शब्दों का कितना अधिक गुणगान होगा जो तेरे समस्त चिन्हों के जनक हैं।
समस्त स्तुति और महिमा तेरी हो ! तू, जिसकी सभी वस्तुओं ने साक्षी दी है कि तू ही है एक सत्य और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू सदासर्वदा से सभी तुलनाओं और उपमाओं से परे है। सभी सम्राट तेरे सेवक हैं और सभी गोचर और अगोचर वस्तुएँ तेरे समक्ष अकिंचन मात्र हैं। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, कृपालु, शक्तिशाली, परमोच्च !
- Bahá'u'lláh