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महिमावंत है तू हे मेरे स्वामी, मेरे ईश्वर! तेरी कृपा के पवन झकोरों के नाम से और उनके नाम से जो तेरे उद्देश्य के दिवानक्षत्र और तेरी प्रेरणा के उद्गम हैं, मैं याचना करता हूं कि मुझ पर और उन सब पर, जो तेरी ओर उन्मुख हुए हैं, वह भेज जो तेरी उदारता और आशीषयुक्त कृपा के समीचीन हो और तेरे वरदानों और अनुग्रह के अनुकूल हो। मैं एकाकी और दीन हूँ, हे मेरे स्वामी! अपनी सम्पदा के सागर में मुझे निमग्न कर ले, प्यासा हूँ, अपनी स्नेहिल कृपा के जीवन-जल का पान करने दे।
तेरे ही नाम से और उसके नाम से जिसे तूने अपने अस्तित्व का प्रकटरूप बनाया है और आकाश तथा धरती पर जो भी हैं उन्हें अपने दिव्य शब्द का बोध कराया है, मैं याचना करता हूँ कि अपने विधान के वृक्ष की छाया तले अपने सेवकों को एकत्र कर और तब इसके मधुर फल का स्वाद लेने दे, इसके पत्तों के स्पंदन से उत्पन्न होने वाले सुमधुर स्वर को समझने और इसकी शाखाओं पर चहकने वाले दिव्य पक्षी के कलरव को सुनने के योग्य बना। तू सत्य ही, संकट में सहायक, पहुँच से परे, सर्वशक्तिशाली और परम कृपालु है।
- Bahá'u'lláh