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हे तू क्षमाशील स्वामी ! तेरे ये सेवक, तेरे साम्राज्य की ओर उन्मुख हो रहे हैं और तेरी अनुकम्पा और दया की कामना कर रहे हैं। हे ईश्वर, इनके हृदयों को निर्मल और पावन कर दे ताकि ये तेरे प्रेम के योग्य बन सकें। इनकी चेतना को शुद्ध एवं पवित्र कर दे ताकि सत्य सूर्य का प्रकाश इनमें चमक सके। इनके नेत्र इस योग्य बना दे कि ये तेरे प्रकाश का अवलोकन कर सकें, इन्हें अपने साम्राज्य की पुकार सुनने के योग्य बना दे।
हे स्वामी, यह सत्य है कि हम दीन-हीन हैं, लेकिन तू तो सर्वसम्पन्न है। हम याचक हैं, तू वह है जिसकी याचना सभी करते हैं। हे स्वामी! हम पर दया कर, हमें क्षमा कर दे, हमें ऐसी शक्ति और सामर्थ्य दे कि हम तेरी अनुकम्पाओं के योग्य बन सकें और तेरे साम्राज्य की ओर आकर्षित हो सकें, ताकि हम जी भरकर कर जीवन-जल का पान सकें, तेरे प्रेम की ज्वाला से प्रदीप्त हो उठें और इस प्रकाश से भरे दिवस में पावन चेतना की सांसों के सहारे पुनर्जीवित हो उठें।
हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! इस सभा पर अपनी प्रेम भरी कृपालुता की दृष्टि डाल। इनमें से प्रत्येक को अपना संरक्षण प्रदान कर, अपने अधीन रख। अपने दिव्य आशीष इन्हें प्रदान कर। इन्हें अपने कृपासागर में निमग्न कर दे और अपनी पावन चेतना की सांसों द्वारा इन्हें नवजीवन प्रदान कर।
हे स्वामी! इस न्यायसंगत सभा को अपनी अनुकम्पायुक्त सहायता प्रदान कर, अपने आशीषों से सम्पुष्ट कर। ये राष्ट्र तेरे संरक्षण की आश्रय दायिनी छाया तले हैं और ये लोग तेरी ही सेवा में संलग्न हैं। हे स्वामी! इन्हें अपने दिव्य आशीष प्रदान कर और अपनी भरपूर अनुकम्पा से इन्हें भर दे। अपने साम्राज्य में इन्हें स्वीकारे जाने योग्य बना। तू शक्तिशाली, सर्वसमर्थ, दयालु और भरपूर अनुकम्पा का स्वामी है।
- `Abdu'l-Bahá