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महिमा हो तेरी, हे अनन्तता के सम्राट, राष्ट्रों के निर्माता और प्रत्येक जर्जर होती अस्थि के स्वरूपदाता! मैं तेरे उस नाम से प्रार्थना करता हूँ, जिसके द्वारा तूने समस्त मानवता का अपनी भव्यता और महिमा के क्षितिज की ओर आह्वान किया है और अपने सेवकों को अपनी गरिमा और अनुकम्पा के प्रांगण की राह दिखलाई है, कि तू मेरी गिनती उनमें कर जिन्होंने स्वयं को तेरे सिवा अन्य सभी कुछ से अनासक्त कर लिया है; और तेरी ओर बढ़ चला है और जिन्हें तेरे द्वारा भेजी गई परीक्षायें भी तेरे उपहारों की दिशा में मुड़ने से रोक नहीं पायी हैं। हे मेरे ईश्वर! तेरी कृपा की डोर को दृढ़ता से थामे हुए मैं तेरे अनुग्रह के परिधान के आंचल के लिपटा हुआ हूँ। अतः, मेरे ऊपर अपनी उदारता के मेघों से वर्षा कर जो मुझे तेरे अतिरिक्त अन्य सभी के स्मरण से मुक्त कर दे और मुझे उसकी ओर उन्मुख होने के योग्य बना दे जो समस्त मानवजाति की आराधना का लक्ष्य है; जिसके विरूद्ध द्रोह भड़काने वालों, संविदा तोड़ने वालों और तुझ पर और तेरे चिन्हों पर अविश्वास करने वालों ने व्यूह रचना की है।
हे मेरे स्वामी, अपने दिवसों में मुझे अपने परिधान की सुरभि से वंचित न कर और अपने मुखड़े के प्रभापुंजों के प्रकटीकरण की घड़ी में अपने धर्म प्रकाशन के उच्छ्वासों से मुझे अलग न रख। तू जैसा चाहे वैसा करने में समर्थ है। तेरी इच्छा का उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकता और न ही जिसे तूने अपनी शक्ति से निर्मित किया है, उसे कोई विफल कर सकता है।
तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, सर्वसमर्थ, सर्वप्रज्ञ।
- Bahá'u'lláh