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लम्बी अनिवार्य प्रार्थना

(चौबीस घंटे में एक बार किये जाने के लिये)

जो कोई भी इस प्रार्थना का पाठ करना चाहे, वह खड़ा होकर ईश्वर की ओर उन्मुख हो, और, जब वह अपने स्थान पर खड़ा हो, वह दायें और बायें देखे, मानो अपने स्वामी, परम दयावान, सहानुभूतिकर्ता की दया की प्रतीक्षा में हो। तब वह कहे:

हे तू, जो समस्त नामों का स्वामी और आकाशों का सृजनकर्ता है! मैं उनके माध्यम से तुझसे याचना करता हूँ जो तेरे सर्वमहिमावान, परमउदात्त, अदृश्य सार के उद्गमस्थल हैं कि मेरी प्रार्थना को ऐसी ज्वाला बना दे जो उन पर्दों को जला डाले जिन्होंने तेरे सौन्दर्य से मुझे दूर रखा है, और एक ऐसा प्रकाश जो तेरी उपस्थिति के महासागर की ओर मुझे ले जाये।

वह तब अपने हाथ ईश्वर - पावन और परमोच्च है वह - कि प्रार्थना में उठाये और कहे:

हे तू, समस्त विश्व की कामना और राष्ट्रों के प्रियतम ! तू मुझे अपनी ओर उन्मुख होते हुये देख रहा है, और तेरे अतिरिक्त अन्य सभी के प्रति आसक्ति से मुक्त, मैं तेरी डोर थामे हुए हूँ,, जिसके स्पंदन से समस्त सृष्टि गतिमान हो उठी है। हे मेरे स्वामी ! मैं तेरा सेवक और तेरे सेवक का पुत्र हूँ! देख, मैं तेरी इच्छा और आकाँक्षा को पूरा करने के लिये उठ खड़ा हुआ हूँ और तेरी सुप्रसन्नता के अतिरिक्त मेरी कोई कामना नहीं है। तेरी दया के महासागर और तेरी अनुकम्पा के दिवानक्षत्र के नाम से मैं तुझसे याचना करता हूँ कि तू अपने सेवक के साथ वह कर जिसकी तू इच्छा करता और चाहता है। तेरी शक्ति की सौगन्ध ! जो समस्त उल्लेख और प्रशंसा से परे हैं। जो भी तेरे द्वारा प्रकट किया गया है वह मेरे हृदय की कामना और मेरी आत्मा को प्रिय है। हे ईश्वर, मेरे ईश्वर ! मेरी आशाओं और मेरे कर्मों को न देख, बल्कि केवल अपनी इच्छा को देख, जिसने धरती और आकाशों को घेर रखा है। हे सभी राष्ट्रों के स्वामी ! तेरे सर्वमहान नाम की सौगन्ध ! मैंने वही चाहा है जो तूने चाहा है और उसी से प्रेम करता हूँ, जिससे तू प्रेम करता है।

तब वह घुटने के बल धरती पर माथा टेक कर कहे:

तू अपने सिवाय किसी अन्य के वर्णन से परे है और स्वयं के अतिरिक्त किसी अन्य की समझ से परे है।

तब खड़ा हो जाये और कहे:

हे मेरे स्वामी, मेरी प्रार्थना को जीवंत जल की एक निर्झरनी बना दे ताकि मैं तब तक जीवित रहूँ जब तक तेरी सत्ता कायम है और तेरे लोकों के प्रत्येक लोक में तेरी चर्चा कर सकूँ।

तब वह पुनः अपने हाथों को प्रार्थना में उठाये और कहे:

हे तू, जिसके वियोग में हृदय और आत्मायें द्रवित हो गई हैं और जिसके प्रेम की ज्वाला से सम्पूर्ण संसार दमक उठा है, और तेरे उस नाम से जिसके द्वारा तूने समस्त सृष्टि को अपने अधीन किया है, तुझसे याचना करता हूँ कि जो तेरे पास है उससे मुझे वंचित न कर, हे तू जो समस्त जनों पर शासन करता है। तू देखता है, हे मेरे स्वामी ! इस अजनबी को तेरी विराटता के वितान तले, तेरी दया की परिधि में, अपने सर्वोच्च निवास की ओर शीघ्रता से जाते हुये, और पथ भटके पथिक को तेरी क्षमा के सागर की याचना करते हुये, और इस पतित को तेरी महिमा के प्रांगण की आकांक्षा लिये, और इस दीन-हीन को तेरी सम्पदा की चमक की ओर निहारते हुए। अधिकार तेरा है, तू जो चाहे आदेश दे सकता है। मैं साक्षी हूँ कि तू अपने कर्मों में स्तुत्य है और तेरे आदेशों का पालन किया जाना ही चाहिये और तू अपने आदेश में सदा ही अप्रतिबंधित रहा है।

तब वह अपने हाथ ऊपर उठाये और तीन बार महानतम नाम का उच्चारण करे। फिर अपने घुटनों पर हाथ रखकर वह ईश्वर - पावन और परमोच्च है वह - के सम्मुख घुटनों के बल झुक जाये, और कहे:

तू देखता है, हे मेरे ईश्वर, कि किस प्रकार मेरे अंग-प्रत्यंग में मेरी चेतना तेरी आराधना की आकाँक्षा लिये और तेरे स्मरण और गुणगान की लालसा लिये स्पंदित हुई है; किस प्रकार यह उसकी साक्षी है जिसका साक्ष्य तेरे आदेश की जिह्वा ने तेरी वाणी के साम्राज्य और ज्ञान के आकाश में दिया। ऐसी अवस्था में, हे मेरे ईश्वर, तेरे पास जो कुछ भी है वह मुझे तुझसे मांगना प्रिय लगता है, ताकि मैं अपनी दरिद्रता दिखा सकूं और तेरी उदारता और तेरी सम्पदाओं का गुणगान कर सकूं और अपनी शक्तिहीनता की घोषणा कर सकूं और तेरी शक्ति तथा सामर्थ्‍य को व्यक्त कर सकूं।

तब वह खड़ा हो जाये और दो बार अपने हाथ प्रार्थाना में ऊपर उठाये और कहे:

तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, सर्वशक्तिशाली, सर्वउदार! तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, तू ही आदि और अन्त का आदेशकर्ता है। हे ईश्वर, मेरे ईश्वर ! तेरी क्षमाशीलता ने मुझे साहस दिया है और तेरी दया ने मुझे शक्ति दी है; तेरी पुकार ने मुझे जगाया है और तेरे अनुग्रह ने मुझे खड़ा किया है और तुझ तक पहुँचने की राह दिखलाई है। अन्यथा मैं कौन हूँ, कि मैं तेरी निकटता के नगर के द्वार तक पहुँचने का साहस जुटा पाता या फिर, तेरी इच्छा के आकाश से प्रस्फुटित प्रकाश की ओर उन्मुख हो पाता ? देखता है तू, हे मेरे स्वामी, तेरी कृपा के द्वार पर यह तुच्छ प्राणी दस्तक दे रहा है और यह क्षणभंगुर जीव तेरी उदारता के हाथों अनन्त जीवन की सरिता की खोज कर रहा है। हर काल में तेरा ही आदेश रहा है, हे तू जो समस्त नामों का स्वामी है, हे आसमानों के रचयिता, तेरी इच्छा के प्रति मेरी स्वीकृति और सहर्ष समर्पण !

तब वह तीन बार हाथ उठाकर कहे:

प्रत्येक महान से ईश्वर महानतर है !

तब वह घुटनों के बल धरती पर अपना माथा टेकते हुए कहे:

तू इस से परे है कि तेरे निकट जनों कि स्तुति तेरी निकटता के आकाश तक पहुँच सके अथवा तेरे प्रति समर्पित जनों के हृदय-पखेरू तेरे प्रवेश मार्ग के द्वार तक पहुँच सकें। मैं साक्षी हूँ कि तू समस्त गुणों से पावन, और समस्त नामों से पवित्र रहा है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, परम उदात्त, सर्व महिमाशाली।

तब वह बैठ जाये और कहे:

मैं प्रमाणित करता हूँ, कि वह, जिसे सभी सृजित वस्तुओं ने, उच्च जन समूह ने, सर्वोच्च स्वर्ग के निवासियों ने और उन सबसे परे सर्वमहिमाशाली क्षितिज से स्वयं भव्यता की जिह्वा ने प्रमाणित किया है कि तू ही ईश्वर है, तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं और यह कि जिसे प्रकट किया गया है वह गूढ़ रहस्य, संचित प्रतीक है जिसके द्वारा ’भ‘ और ’व‘ अक्षर परस्पर जोडे़ और बुन दिये गये है। मैं प्रमाणित करता हूँ कि यह वही है जिसका नाम सर्वोच्च की लेखनी द्वारा लिपिबद्ध किया गया है और जिसका उल्लेख ईश्वर की पुस्तकों में किया गया है जो ऊपर सिंहासन और नीचे धरती का स्वामी है।

तब वह सीधा खड़ा हो जाये और कहे:

हे समस्त प्राणियों के स्वामी और सभी दृश्य-अदृश्य वस्तुओं के मालिक ! तू देखता है मेरे आँसुओं को और मेरी आहों को जो मैं भरता हूँ और सुनता है तू मेरी कराह और मेरे चित्कार को और मेरे हृदय के विलाप को। तेरी शक्ति की सौगंध ! मेरे अतिक्रमणों ने मुझे तेरी समीप आने से रोका है और मेरे पापों ने मुझे तेरी पावनता के प्रांगण से बहुत दूर कर दिया है। हे मेरे स्वामी, तेरे प्रेम ने मुझे समृद्ध बनाया है और तेरे वियोग ने मुझे नष्ट कर दिया है और तुझसे दूरी ने मुझे क्षीण कर दिया है। इस वीराने में तेरे पदचापों के माध्यम से, और इन शब्दों के द्वारा कि “मैं यहीं हूँ”, “मैं यहीं हूँ”, जिन शब्दों का तेरे प्रियजनों ने इस विराटता में उच्चारण किया है, मैं तेरे प्राकट्य के श्वांसों के माध्यम से, और तेरे प्रकटीकरण के प्रभात की मृदुल बयारों के माध्यम से, मैं तुझसे याचना करता हूँ कि ऐसा विधान कर कि मैं तेरे सौन्दर्य के दर्शन कर सकूँ, और जो कुछ भी तेरे पावन ग्रंथ में है उसका अनुपालन कर सकूँ।

तब वह महानतम् नाम का तीन बार उच्चारण करे और घुटनों पर हाथ रखते हुए झुके और कहे:

स्तुति हो तेरी, हे मेरे ईश्वर, कि तेरा स्मरण करने और तेरा यशगान करने में तूने मेरी सहायता की है, तूने ही दिया है उसका ज्ञान जो तेरे चिह्नों का उद्गमस्थल है, तूने ही बनाया है इस योग्य मुझे कि तेरे स्वामित्व के समक्ष विनत हो सकूँ और तेरे ईश्वरत्व के प्रति विनम्र रह सकूँ और तेरी महिमा की जिह्वा द्वारा जो कुछ भी उच्चारा गया है उसे स्वीकार कर सकूँ।

तब वह खड़ा हो जाये और कहे:

हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! मेरे पापों के बोझ से मेरी कमर झुक गई है; मेरी लापरवाही ने मुझे बर्बाद कर दिया है। जब कभी भी मैं अपने दुष्कर्मों और तेरी हितेषिता के विषय में सोचता हूँ तो मेरा हृदय, अन्दर-ही-अन्दर द्रवित हो उठता है, और रक्त मेरी शिराओं में उद्वेलित हो जाता है। तेरे सौन्दर्य की सौगन्ध, हे तू, विश्व की कामना! लज्जित हूँ मैं तेरी ओर देखने में, याचना भरे अपने हाथ तेरी कृपा के आकाश की ओर फैलाने में। तू देखता है, मेरे आँसू तुझे याद करने में तेरा गुणगान करने में कैसे अवरोध बने हैं, हे तू जो सर्वोच्च सिंहासन और धरती का स्वामी है ! तेरे साम्राज्य के चिह्नों और तेरी प्रभुत्व के रहस्यों द्वारा मैं तुझसे याचना करता हूँ कि हे सबके स्वामी! कि अपने प्रियजनों के साथ अपनी अनुकम्पा और गरिमा के अनुरूप व्यवहार कर, हे गोचर और अगोचर के सम्राट !

तब वह तीन बार महानतम् नाम का उच्चारण करे और घुटनों के बल धरती पर माथा टेक कर कहे:

स्तुति हो तेरी, हे हमारे ईश्वर ! कि तूने हम तक वह भेजा है जो हमें तेरी निकटता की ओर आकर्षित करता है और तेरे ग्रंथों और तेरे लेखों में उल्लिखित प्रत्येक उत्तम वस्तु हमें प्रदान करता है। हम याचना करते हैं, हे मेरे स्वामी, हमें व्यर्थ विचारों और निरर्थक कल्पनाओं से बचा। तू, सत्य ही, शक्तिशाली, सर्वज्ञ है।

तब वह अपना सर उठाये, बैठ जाये और कहे:

हे मेरे ईश्वर, मैं उसका साक्षी हूँ जिसके साक्षी तेरे प्रियजन हैं, और स्वीकार करता हूँ मैं उसको, जिसे सर्वाच्च स्वर्ग के निवासियों ने और तेरे शक्तिशाली सिंहासन की परिक्रमा करने वालों ने स्वीकार किया है। धरती और आकाश के साम्राज्य तेरे ही हैं, हे समस्त लोकों के स्वामी !

 


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