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हे दिव्य विधाता! जिस तरह में दैहिक कामनाओं, अन्न और जल से विरक्त हूँ, वैसे ही मेरे हृदय को भी अपने अतिरिक्त अन्य सब के प्रेम से शुद्ध और निर्मल कर दे। मेरी आत्मा को भ्रष्ट इच्छाओं और भ्रष्ट प्रवृत्तियों से बचा, इसकी रक्षा कर, ताकि मेरी चेतना पवित्रता की श्वांस के साथ संलाप कर सके और तेरे अतिरिक्त अन्य सबका परित्याग कर सके।
- `Abdu'l-Bahá