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शत्-शत् नमन इस युग को, एक ऐसा युग जिसमें दया की सुरभि समस्त सृजित वस्तुओं पर तरंगित हुई है, एक ऐसा समृद्ध युग जिसकी बराबरी अतीत के कालों और शताब्दियों से कभी भी नहीं की जा सकती, एक ऐसा युग जब प्राचीनतम प्रभु ने अपना रूख अपने पावन आसन की ओर किया है। वहाँ समस्त सृजित वस्तुओं ने और उनके अलावा देवदूतों ने गुहार लगाई है, ”हे कार्मल (पर्वत) तू शीघ्रता कर, देख! ईश्वर के मुखमंडल का प्रकाश, नामों के साम्राज्य के सम्राट और स्वर्गों के रचयिता का पदार्पण यहाँ हुआ है।“
आनन्दविह्वल कार्मल का स्वर कुछ इस प्रकार गूंजा, ”मेरा जीवन तेरे लिये बलिदान हो जाये, तूने मेरी ओर निहारा है, अपनी कृपा मुझ पर बरसाई है और अपने पग मेरी ओर बढ़ाये हैं। हे अनन्त जीवन के उद्गम, तेरे वियोग में मैं प्राणविहीन हो गया,
विरह ने मेरी आत्मा झुलसा दी है। तुझे शत्-शत् प्रणाम, कि तूने मुझे अपनी पुकार सुनने के योग्य बनाया, अपने पग मेरी ओर बढ़ाकर मुझे मान दिया और अपने इस युग की जीवनदायिनी सुरभि से मेरी आत्मा को नवस्फूर्ति दी, तेरी महालेखनी की गूंज तेरे लोगों के बीच तेरा आह्वान है और जब वह घड़ी आई तब तुम्हारा प्रतिरोधरहित धर्म प्रकट किया गया तब तूने अपनी महालेखनी में अपनी श्वांस फूंक दी और देखो, समस्त सृष्टि कम्पायमान हो उठी और उस ईश्वर के कोषागार में छिपे, सभी गुप्त रहस्यों पर से पर्दा उठ गया, ईश्वर जो सभी सृजित वस्तुओं का स्वामी है।“
जैसे ही उसकी आवाज प्रभु के पावन पर्वत तक पहुँची वैसे ही हमने उत्तर दिया, ”हे कार्मल, अपने स्वामी को धन्यवाद दो। मुझसे विरह की अग्नि तुम्हें दग्ध करती जा रही थी, मेरी उपस्थिति का महासागर जब तुम्हारे समक्ष उमड़ा तो तुम्हारे नेत्रों में प्रसन्नता की लहर दौड़ आई और समस्त सृष्टि हर्षोन्मान्दित हो गई तथा सभी दृश्य तथा अदृश्य वस्तुओं के बीच आनन्द व्याप्त हो गया। खुशियाँ मनाओ, क्योंकि इस युग में ईश्वर ने तुम पर अपना सिंहासन स्थापित कार्मल की पाती किया है, तुम्हें अपने चिन्हों का उद्गम स्थल बनाया है और अपने प्रकटीकरण के प्रमाणों का दिवानक्षत्र माना है। उसका सौभाग्य है जो तुम्हारी परिक्रमा करता है जो तुम्हारी महिमा के प्रकटीकरण का उद्घोष करता है और उस आशीष का स्मरण करता है जो तुम्हारे स्वामी ने कृपापूर्वक तुम पर बरसाये हैं। सर्वमहिमाशाली अपने स्वामी के नाम पर अमरत्व के पात्र को कसकर थाम लो और उसे धन्यवाद दो, क्योंकि तुम पर अपनी दया के प्रतीकस्वरूप उसने तुम्हारी वेदना को प्रसन्नता में बदल दिया है और तुम्हारे कष्टों को आशीषपूर्ण आनन्द का रूप दिया है। वस्तुतः, वह उस स्थान को प्रेम करता है जो उसका सिंहासन बनाया गया है, जिस पर उसके पग पड़े हैं, जो उसकी उपस्थिति से सम्मानित हुआ है, जहाँ से उसने महाशंखनाद किया है और जिस पर उसने अपने आँसू बहाये हैं।“
”हे कार्मल, जिऑन को गुहार लगा और यह शुभ संदेश दे: वह जो नश्वर नेत्रों से ओझल था, प्रकट हो गया है! उसकी सर्वविजयी प्रभुसत्ता स्थापित हुई है, उसकी सर्वग्राही भव्यता प्रकट हुई है। सावधान! कहीं तुम संकोच न कर बैठो या अपने कदम रोक न लो। शीघ्रता करो और आगे बढ़ कर ईश्वर के नगर की परिक्रमा करो जो स्वर्गिक काबा से अवतरित हुआ है, जिसके इर्द-गिर्द ईश्वर के प्रिय पात्रों ने, शुद्ध हृदय लोगों ने और देवदूतों ने परिक्रमा की है। देखो, किस प्रकार से धरती के कोने-कोने में, इसके प्रत्येक नगर में इस प्रकटीकरण के शुभ संदेश का उद्घोष करने के लिये आकुल हूँ - एक ऐसा प्रकटीकरण जिसकी ओर सिनाई पर्वत का हृदय आकर्षित हुआ है और जिसके नाम की गुहार सदा ”प्रज्ज्वलित झाड़ी“ ने लगाई है, ”धरती और स्वर्ग के सभी साम्राज्य स्वामियों के स्वामी ईश्वर के हैं“ सत्य ही, यह वह युग है, जिसमें धरती और सागर दोनों इस उद्घोष पर आनन्दविह्वल हुए हैं, वह युग जिसके लिये नश्वर मानव के मन-मानस की समझ से परे वे सभी वस्तुएँ दी गई हैं जिन्हें ईश्वर ने अपने कृपास्वरूप निर्धारित की हैं। शीघ्र ही प्रभु अपने संदेश की नौका तुम्हारे मन-सागर तक लायेगा और बहा के उन लोगों को प्रकट करेगा जो ”महानामों की पुस्तक“ में वर्णित किये गये हैं।“
कार्मल की पाती समस्त मानवजाति के स्वामी का जयघोष हो, जिसके नाम मात्र की चर्चा से धरती का कण-कण कम्पायमान हो उठा और महिमा की वाणी ने मुखरित हो उसे अनावृत किया जो ईश्वर के ज्ञान से आवृत उसकी शक्ति के कोषालय में अब तक गुप्त था। सत्यतः वह सर्वशक्तिशाली, सर्वोच्च ईश्वर अपने नाम की अंतःशक्ति के सहारे उन सब का सम्राट है जो स्वर्गों में और पृथ्वी पर हैं।
- Bahá'u'lláh